
गुरप्रीत कौर, प्रसिद्ध लेखिका, भठिंडा (पंजाब)
बारह साल हो चुके थे हरमन और परमिंदर की शादी को। लेकिन घर में अब तक बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी।
हरमन का यह दूसरा विवाह था – जैसे परमिंदर का भी।
हरमन की पहली पत्नी अपने सात साल के बेटे के साथ आई थी, पर कुछ ही समय बाद लड़ाई-झगड़ों और हरमन की बेरोज़गारी से तंग आकर उसे छोड़ गई। घर में बस हरमन और उसकी बूढ़ी माँ रह गए। माँ रजाइयाँ और गद्दे बनाकर किसी तरह घर चलाती रही।
कुछ सालों बाद परमिंदर आई – एक नई उम्मीद बनकर। मगर हरमन में कोई बदलाव नहीं आया। न काम, न ज़िम्मेदारी। दिन भर घर में खाली बैठना उसकी आदत बन चुकी थी।
परमिंदर ने तंग आकर खुद कुछ करने का निश्चय किया। पास के मोहल्ले में डॉक्टर मंजीत का क्लिनिक था – अविवाहित, जवान और पैसेवाला। परमिंदर ने वहीं काम शुरू किया – घर की सफाई, खाना बनाना, और क्लिनिक में हाथ बँटाना।
शुरुआत में सब ठीक चला, लेकिन धीरे-धीरे परमिंदर का घर लौटना कम हो गया। मोहल्ले में बातें उठने लगीं – “परमिंदर का डॉक्टर मंजीत से चक्कर चल रहा है।”
लोग कहते, “क्लिनिक बंद, दरवाज़ा बंद – अंदर क्या चलता है, सब जानते हैं।”
हरमन और उसकी माँ ने बहुत समझाया, रोका भी, मगर परमिंदर नहीं मानी। हरमन की अपनी कमजोरी थी – न वो पत्नी को शारीरिक सुख दे पाता था, न घर खर्च। उसके पास न अधिकार बचा था, न हिम्मत।
उधर मंजीत भी कोई वफ़ादार नहीं था। उससे पहले भी उसका एक रिश्ता था – चरनो नाम की औरत के साथ, जो उम्र में उससे दुगुनी थी लेकिन अमीर थी। चरनो अब भी उसके जीवन में थी, और उसने अपने “खबरी” लगाए हुए थे, जो परमिंदर और मंजीत के रिश्ते की खबर उसे पहुँचाते रहते।
एक दिन मोहल्ले में बड़ा हंगामा हुआ। चरनो ने सबके सामने परमिंदर को खरी-खोटी सुनाई। फिर भी मंजीत ने किसी का साथ नहीं छोड़ा – न चरनो का, न परमिंदर का।
उसका कहना था – “दोनों का मेरे जीवन में अलग-अलग रोल है। जो चरनो कर सकती है, वो परमिंदर नहीं कर सकती, और जो परमिंदर कर सकती है, वो चरनो नहीं कर सकती।”
चरनो के पैसे से मंजीत बार-बार पुलिस की गिरफ्त से बच जाता, क्योंकि क्लिनिक की आड़ में वो नशे की गोलियाँ बेचता था।
बावजूद इतने हंगामों के, परमिंदर और मंजीत की मुलाकातें नहीं रुकीं।
और एक दिन – परमिंदर माँ बनने वाली थी।
जब उसके प्रसव का समय आया, तो हरमन और उसकी माँ ने ही उसे अस्पताल पहुँचाया। रात में परमिंदर ने एक प्यारी-सी बच्ची को जन्म दिया।
डॉक्टर ने बाहर आकर कहा – “बधाई हो, लड़की हुई है।”
हरमन ने बच्ची को देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। उसकी माँ ने बच्ची को गोद में उठाते हुए बस इतना कहा –
“ये बच्ची हरमन की नहीं… मंजीत की है। हमारा हरमन तो बच्चा पैदा कर ही नहीं सकता।”
फिर भी, समाज की इज़्ज़त बचाने के लिए दोनों परमिंदर और उस बच्ची को घर ले आए।
मोहल्ले में सब जानते थे सच्चाई – पर कोई कुछ नहीं बोला।
हरमन की माँ अब भी रजाइयाँ बनाती थी – हर टाँके में अधूरी उम्मीदें सीती हुई।
और परमिंदर… वो अपनी बच्ची को देखकर मुस्कुराती थी – शायद पहली बार उसे जीवन में कोई सच्चा रिश्ता मिला था, चाहे समाज उसे कितना भी नाम दे।
