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निर्लज्ज…

हर सुबह रिनी को वही काले-कलूटे अधेड़ की घूरती नज़रें तड़पा देती थीं। आज गुस्सा चरम पर था. बस पहुँचकर उसने राहत की साँस ही ली थी कि ड्राइवर बोला, “रघु भैया कह गए हैं, आप सीढ़ियाँ चढ़ जाएँ तभी बस स्टार्ट करना… अकेली रहती हैं, सुरक्षित नहीं है न।”सुनकर रिनी ठिठक गई“तो इसलिए वो मुझे घूरता था…”
ड्राइवर की अगली बात ने जैसे उसके भीतर कुछ तोड़ दियारघु अपनी बेटी की दर्दनाक मौत के बाद हर लड़की पर निगरानी रखता था।
पश्चाताप से भरी रिनी ने सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पलटकर देखा बस धीरे से घरघराती हुई आगे बढ़ चुकी थी।

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दो सितारों का मिलन…42 साल बाद

बयालीस साल बाद हुई यह मुलाकात सिर्फ दो पुराने साथियों के मिलने भर की नहीं थी, बल्कि उन दिनों की धड़कनों को फिर से जी लेने जैसा अनुभव थी। इंदौर की गलियों में साइकिल से खबरों की तलाश में दौड़ते हुए बिताए गए वे दिन यादों की परतों से झाँकने लगे — अनंत चतुर्दशी की रातें, दंगों के बीच रिपोर्टिंग की बेचैनी, और श्मशानघाटों से जुटाई गई खबरों की जिम्मेदारी।

रतलाम के घर में बैठे हुए, चाय की प्यालियों के बीच समय जैसे ठहर गया था। हम दोनों बीच-बीच में ठहाके लगाते, कभी पुराने नामों को याद करते और कभी आज की पत्रकारिता पर अफसोस जताते। प्रदीप जब अपनी खबरों के डिजिटलाईजेशन की बात कर रहे थे, तो मन में एक अजीब कसक उठी — कुछ चीज़ें वक्त के साथ सँभाल लेनी चाहिए थीं।

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जिंदगी के पन्नों में तुम्हारा स्पर्श

मैं एक किताब थी, धूल भरी लाइब्रेरी के कोने में पड़ी हुई। पन्ने पुराने थे, कवर किसी को आकर्षित करने लायक नहीं। एक ऐसी किताब जिसे शायद ही कभी पढ़ा गया हो।

एक दिन तुम मुझसे टकराए। तुमने मुझे उठाया और पढ़ना शुरू किया। पहले पन्ने पर मेरी प्रस्तावना पढ़ते ही मुझे डर लगा कि अब तुम मेरी सोच और भावनाओं को आंक दोगे। पर जैसे ही तुमने आगे पढ़ा, तुम मुस्कुराए। तुम्हारी मुस्कान ने मुझे जिम्मेदारी का एहसास कराया – कि तुम्हें निराश नहीं होने दूँगी।

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चरैवेति का अर्थ

चरैवेति – चलना मनुष्य का धर्म है। घुमक्कड़ी केवल यात्रा नहीं, बल्कि जिज्ञासा, अनुभव और आत्मशक्ति का मार्ग है। आदिम मनुष्य से लेकर आधुनिक घुमक्कड़ों तक, हर कदम हमें प्रकृति, समाज और संस्कृति से जोड़ता है। यही जिज्ञासा हमें नई कल्पनाओं और अंतहीन संभावनाओं की ओर ले जाती है।”

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बच्चों का बदलता व्यवहार

बचपन के वो दिन अब दूर हो गए जब बच्चे मां के आंचल में सुकून ढूंढते और पिता की बातों में जीवन का ज्ञान पाते। गलियों और मैदानों में खेल, दादी-नानी की कहानियाँ और माता-पिता का आदर अब कहीं खो सा गया है। आज बच्चे मोबाइल की स्क्रीन और डिजिटल दुनिया में खोए हुए हैं।पहले जैसा प्यार और सम्मान अब कम नजर आता है, माता-पिता की सीख बोझ लगती है और संस्कार भूलते जा रहे हैं। पढ़ाई का दीपक मंद पड़ता है और सपनों का आंगन सिकुड़ता है।
फिर भी उम्मीद बाकी है। यदि माता-पिता बच्चों को प्यार और समझ से मार्गदर्शन देंगे, तो उनका भविष्य और संस्कार फिर से चमकने लगेंगे।

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