रंग–रंग में बसा जीवन

जीवन को रंगों ने हमेशा ही नए अर्थ और नई दिशा दी है। लाल रंग माँ की बिंदी की तरह स्नेह और खुशियों का संदेश देता है, हरा रंग धरती की हरियाली बनकर मन में शीतलता और समृद्धि का भाव जगाता है। नीला रंग आसमान की तरह मन को उड़ान और शांति दोनों देना जानता है, जबकि सफ़ेद रंग सरस्वती की पवित्रता में ज्ञान और सादगी का प्रतीक बन जाता है। भगवा रंग सनातन संस्कृति की जड़ से जोड़कर जीवन में अनुशासन और संस्कारों का उजास भरता है। हर रंग अपनी अलग महिमा लिए हुए है और हर रंग जीवन को किसी न किसी रूप में सम्पन्न और सार्थक बनाता है।

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स्त्री

स्त्री, हर ताले की चाबी अपने पास रखती है। घर के हर कोने में, हर रिश्ते में, वह सबकी ज़रूरतों और सपनों के ताले बड़ी आसानी से खोल लेती है। लेकिन विडंबना यह है कि उसके पास कभी अपनी ही मनमर्ज़ी की चाबी नहीं होती। दूसरों के लिए खुली हुई दुनिया के बीच, उसके अपने इच्छाओं का द्वार अकसर बंद रह जाता है।

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मोह और प्रेम

लिखने को कुछ नहीं था, परंतु शब्द मस्तिष्क में ऐसे कुलबुला रहे थे मानो बाहर आने को व्याकुल हों।
मन के दो छोर सामने थे—एक ओर मोह, जो मुट्ठी में क़ैद था, और दूसरी ओर प्रेम, जो आज़ाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था। यह विडंबना ही थी कि प्रेम ने ही मोह को जन्म दिया, फिर भी उसी की कैद प्रेम को असह्य हो गई।मोह के भीतर संदेह के जीवाणु पलते रहे, जिन्हें प्रेम ने कभी स्वीकार नहीं किया।प्रेम बसंत की शुरुआत था—नवजीवन का उत्सव, जबकि मोह पतझड़ का सूना संदेश।
प्रेम उमड़ते समंदर की लहर था, मोह रेत का वह कण, जो मुट्ठी में थमता ही नहीं और फिसल जाने को आतुर रहता है।

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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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 युगान्तर

उस दौर में जीवन के उपन्यास पर हस्ताक्षर करना इतना आसान नहीं था, जैसे आज है। मानो जैसे अंगारों पर चलना हो। फिर भी उसे सच बताना पड़ा और मुझे सच छुपाना पड़ा। वह एक संपूर्ण प्रेम-ग्रंथ था और मैं पाँच कोस की बदलती बोली। जीवन के कोरे कागज़ पर उसने मनमर्ज़ियाँ लिखीं और मैंने बंदिशें। कागज़ और स्याही किसी के पास नहीं थे, बस अनाम सी एक उड़ान थी। यक़ीन के साहिल पर वह ठहरा रहा और मैं वक़्त की नज़ाकत में बहती चली गई। उसने चक्रव्यूह की सलाखें तोड़ दीं, जबकि मैं सही और ग़लत के भँवर में उलझती रही। उसके लिए फ़ासले और फ़ैसले कम थे, मगर मेरे लिए वही बहुत भारी थे—कभी वक़्त के और कभी दहलीज़ के।

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चांद को ग्रहण

चाँद को ग्रहण लगने की बात केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि भावनाओं और विश्वासों से जुड़ी है। प्रेम का प्रतीक यह चाँद कभी उपहास का पात्र नहीं बन सकता। सच तो यह है कि चाँद को ग्रहण नहीं, बल्कि नज़र लगती है—क्योंकि हर पूर्णिमा को पूरी दुनिया उसे निहारती है, उसकी सुंदरता को नज़र भर-भरकर देखती है। यही कारण है कि कभी वह बादलों में छिप जाता है, तो कभी लोग उसे नज़र उतरने के लिए दुआओं और टोटकों में बाँध देते हैं। वास्तव में चाँद सदा निर्मल है, ग्रहण तो हमारी धारणाओं का है।

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अमर बेल-सी है ज़िंदगी

ज़िंदगी अमर बेल की तरह है। यह अपने आप पनप उठती है, चाहे घर में ही क्यों न पड़ी हो। सूखती नहीं, बल्कि मिट्टी की तलाश करती है जहाँ अपना हरित तत्व फैला सके। इसमें खुद को समाप्त करने की प्रवृत्ति नहीं होती। नन्हीं-नन्हीं कोमल पत्तियाँ निकल आती हैं और बेल की लताएँ सूखी-मुरझाई डंडियों को भी ढक लेती हैं।

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प्रेम शाप है….

यहाँ प्रेम को शाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो नाश और विरक्ति के साथ-साथ एक अमरता का भाव भी लिए है। शहरों का विकास प्रकृति को निगल गया, परंतु शापित खंडहर अब भी अछूते हैं—मानो प्रेम भी उसी तरह समय और विनाश से परे जीवित रहता है। सूखी नदियाँ, वीरान इमारतें और तप्त अधर—ये सभी स्मृतियों और अधूरेपन के प्रतीक हैं। वक्ता मानो किसी पूर्वजन्म की स्मृति से बंधा हुआ है, और प्रेम को “सांकेतिक मरीचिका” कहकर उसकी अस्थिरता और मृगतृष्णा-सी प्रकृति को सामने लाता है।

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 समानता का दावा 

हमारे समाज में बराबरी का दावा तो बहुत किया जाता है, मगर हकीकत कुछ और ही है। एक ओर बेटों की चाह में बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है, तो दूसरी ओर दहेज के लिए उन्हें जलाया जाता है। बलात्कारियों को बचाने की कोशिश की जाती है, जबकि पीड़िताओं से कठोर सवाल पूछे जाते हैं।

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अस्तित्व…

अस्तित्व की खोज में वह खुद से बार-बार टकराती है। कभी सपनों में, कभी आकांक्षाओं में, तो कभी शब्दों की परछाइयों में अपने होने का अर्थ तलाशती है। वह अपने भीतर दबे सवालों को सुनती है—”कौन हूँ और क्या हूँ मैं?” और हर बार यह अहसास होता है कि उसका वजूद अभी अधूरा है। यही अधूरापन उसे फिर से जगाता है, नव-कोंपलों-सा उगाता है। अंततः वह अपने भीतर एक ऐसा वृक्ष देखती है, जो अपनी जड़ों से अनगिनत संभावनाएँ पोषित करता है। यही उसका नया अस्तित्व है—सशक्त, गहन और अडिग।

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