अमर बेल-सी है ज़िंदगी

अमर बेल-सी है ज़िंदगी,
खुद ही पनप उठती है।
घर में पड़ी हुई भी नहीं सूखती,
बढ़ने लगती है, तलाशती रहती है
ज़िंदगी को…

मिट्टी जहाँ फैला सके अपना
हरित तत्व।
नहीं करती स्वयं को समाप्त,
निकल आती हैं नन्हीं-नन्हीं
कोमल पत्तियाँ।

और बढ़ने लगती हैं लताएँ,
जो छुपा लेती हैं
सूखी, मुरझाई डंडियों को।
बिखरी होती है तो बस
चारों ओर हरियाली ही हरियाली।

संग में करती है मदद प्रकृति,
सूखी डालियों को गिराकर
अपना हरा-भरा संसार बनाने को।

बस रहती है तो चारों ओर
हरियाली ही हरियाली।
बस यही है—
अमर बेल-सी ज़िंदगी।

सुरभि डागर, प्रसिद्ध लेखिका, बिजनौर

3 thoughts on “अमर बेल-सी है ज़िंदगी

  1. अमर बेल के बीज बोते हुए हमने कभी किसी को नहीं देखा । स्वयं हरित छोटी पत्तियों को पोषित करके उनसे चारों तरफ हरियाली फैलाता जाता है । इसकी डालियाँ थोड़ा-बहुत आसमान की ओर बढ़कर फिर धरती की तरफ बढती हैं जब तक कि पेड़ की जड़ का स्वरूप न ले लें । इसलिए इसको अमर बेल कहा जाता है । यह कभी खत्म नहीं होता ।

  2. सुरभि जी ने अमरबेल का चित्रण हमारी जीवन यात्रा से बहुत सुंदर और सटीक किया है ।
    बहुत बधाई।

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