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तेरी बिंदी

“क्या हुआ निखिल? इतनी दूर से बार-बार इशारा क्यों कर रहे हो? कुछ समझ नहीं आ रहा।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा और फिर से कार्यक्रम में तल्लीन हो गई।

निखिल धीरे-धीरे भीड़ चीरते हुए उसके समीप पहुँचा। स्वर में हल्की झुंझलाहट और अपनापन मिला हुआ था—
“नंदिनी, पागल हो क्या? इतनी भीड़ में भी मुझे यूँ तड़पाती हो! मुझे मालूम था, कल मैंने कहा था तो आज तुम वैसा अवश्य करोगी।”

नंदिनी ने विस्मित दृष्टि से उसे देखा—
“मैंने ऐसा क्या किया है?”

निखिल ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा—
“आज तुम्हारे भाल पर बिंदी बीचों-बीच सजनी चाहिए थी, पर तुमने उसे किनारे सरका दिया। यह कैसी गुस्ताख़ी? बस उसी को ठीक करने आया हूँ।”

नंदिनी सकुचाई—
“तो इतने पास क्यों चले आए?”

निखिल शरारत से मुस्कुराया—
“क्योंकि मेरा हाथ बाँस जितना लंबा तो है नहीं।”

“तुम हमेशा मज़ाक ही करते रहते हो…”

“नहीं नंदिनी, सच बताओ—जब तुमने यह बिंदी लगाई थी, क्या उस पल मुझे जिया था? क्या तुम्हारे होंठों पर मंद मुस्कान इसलिए आई थी कि तुम्हें मेरा ध्यान आ गया था?”

नंदिनी मौन रही। उसके हृदय की धड़कनें असामान्य हो चुकी थीं।
निखिल ने धीरे से उसकी बिंदी को भौंहों के मध्य टिका दिया। एक पल को दोनों की साँसें थम-सी गईं। वे अनुभूतियों में डूबे थे, फिर भी अपने जज़्बात छुपाने में उतने ही दक्ष। और यह भी जानते थे कि दूसरा भी वही कर रहा है।

रात को घर आकर नंदिनी ने आईने से बिंदी उतारी, उसे सीने से भींचा और फिर आईने पर चिपकाते हुए धीमे से बोली—
“अब यहाँ विराजिए निखिल जी… और हाँ, आँखें बंद रखना। मैं सोने जा रही हूँ।”

सुबह की ताजगी ने उसे अचरज से भर दिया। जब उसी बिंदी को माथे पर सजाया तो भीतर आत्मा तक में सुकून उतर आया।
वह सोचने लगी—
“निखिल ने तो बस बिंदी बीच में लगाई थी… फिर यह कैसा परिवर्तन? यह कैसी अनकही शक्ति?”

उसे स्मरण हुआ, कल निखिल ने कहा था कि कॉलेज लाइब्रेरी की उसकी मेज़ पर एक सरप्राइज़ मिलेगा।
नंदिनी फौरन तैयार हुई, माथे पर वही बिंदी सजाई और दौड़ पड़ी।

टेबल पर एक पैकेट रखा था। भीतर एक पर्ची—
“इस जन्म में यह संभव नहीं हो पाएगा… इसलिए स्केच में ही अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं। यदि यह तुम्हें दुखी करे तो तुरंत फाड़ देना और मुझे क्षमा कर देना।”

हाथ काँपते हुए उसने स्केच खोला—वह उसकी ही छवि थी। माथे पर लाल बड़ी बिंदी और माँग में सिंदूर भरा हुआ। नीचे लिखा था—
“एक संपूर्ण रमणी नंदिनी।”

उसकी आँखें नम हो आईं। उसने स्केच को सीने से लगा लिया। दूर खड़ा निखिल उसे देख रहा था और आत्ममुग्ध होकर लौट गया।

नंदिनी मन ही मन गुनगुनाते हुए चल पड़ी—
“जिस्म की बात नहीं थी, तेरे दिल तक आना था…”

सवितासिंह मीरा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

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