एक इस्तीफ़ा अगर हो भी जाता तो क्या होता

"दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन, शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग और सोनम वांगचुक के अनशन का प्रतीकात्मक दृश्य।" "दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन का प्रतीकात्मक दृश्य।"

.डॉ. हरीशकुमार सिंह, उज्जैन

नीट प्रश्नपत्र लीक होने पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर इक्कीस दिन से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को, दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश कि वांगचुक का नियमित शारीरिक परीक्षण हो और ज़रूरत हो तो इलाज किया जाए, के बाद दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को जंतर-मंतर से उठाकर अस्पताल में भर्ती कराकर उचित किया है।

मई माह में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक मामले में सुनवाई के दौरान फर्जी कार्यकर्ताओं और बेरोजगार युवाओं की तुलना काकरोच से करने पर एक व्यंग्यात्मक डिजिटल आन्दोलन के तहत एक युवक ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर काकरोच जनता पार्टी बना डाली और हंसी-मज़ाक में इसके करोड़ों युवा अनुयायी बन गए। रातों-रात इतने अनुयायी देखकर इसके संस्थापक के मन में भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग उठी और काकरोच जनता पार्टी ने पहले 6 जून को अपने पाँच घंटे के प्रदर्शन में केंद्रीय शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दो की मांग रखी और फिर 28 जून 2026 से पहला बड़ा जमीनी आन्दोलन, जिसमें जंतर-मंतर पर वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठ गए, ‘शिक्षा मंत्री हटाओ’ आन्दोलन आरम्भ कर दिया। काकरोच जनता पार्टी को लगा था कि उनके इस आन्दोलन को व्यापक समर्थन मिलेगा, पर लगभग सभी विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस आन्दोलन को समर्थन नहीं दिया और काकरोच जनता पार्टी अकेले पड़ गई। सोशल मीडिया पर करोड़ों अनुयायी होने पर भी जंतर-मंतर पर वह भीड़ नहीं जुट पाई, जिसकी अपेक्षा थी। वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराने के कुछ पहले ज़रूर कुछ राजनेता उनसे मिलने पहुँचे।

लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने काकरोच जनता पार्टी के इस आन्दोलन का आरम्भ से ही समर्थन किया था क्योंकि केंद्र सरकार ने लेह में हिंसा को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत सितम्बर 2025 में वांगचुक को हिरासत में लेकर जोधपुर जेल भेजा था और मार्च 2026 में छोड़ा था। वांगचुक ने काकरोच जनता पार्टी के समर्थन में 28 जून से आमरण अनशन शुरू किया। आन्दोलन आरम्भ करते समय काकरोच जनता पार्टी यह भूल गई थी कि वर्तमान केंद्र सरकार ऐसे व्यर्थ के आन्दोलनों को कोई महत्त्व नहीं देती है क्योंकि इसके पहले दिल्ली बॉर्डर पर तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर किसानों ने लगभग 380 दिन धरना दिया था और करीब 700 किसानों की जान जाना बताया गया था। नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर भी देश भर में दिसम्बर 2019 में आन्दोलन हुआ, मगर मार्च 2020 में कोरोना की आहट पर ये आन्दोलन स्वतः बंद हो गए थे। प्रधानमंत्री भी फरवरी 2021 में ऐसे आन्दोलन करने वालों को आन्दोलनजीवी कह चुके थे।

जाहिर है, केंद्र सरकार ने ऐसे आन्दोलनों को अनावश्यक मानकर कभी ज़्यादा तवज्जो नहीं दी। मगर ऐसे आन्दोलनों के दूसरे पक्ष पर भी विचार ज़रूरी है। अपने देश का तो आज़ादी के पहले से ही आन्दोलनों, हड़तालों और प्रदर्शनों का इतिहास रहा है, जिस पर आज भी हम सब गर्व करते हैं। प्रधानमंत्री स्वयं समय-समय पर यह कह चुके हैं कि देश में स्वतंत्र मीडिया और मजबूत विपक्ष का होना प्रजातंत्र के लिए ज़रूरी है। काकरोच जनता पार्टी से सोशल मीडिया पर करोड़-दो करोड़ से ज़्यादा युवा अनुयायी होने का अनुमान है। ऐसे में अगर इन युवाओं की कोई एक बात भी सुन ली जाती या मान ली जाती, तो क्या फ़र्क पड़ जाता? क्या केंद्र सरकार अपने किसी प्रतिनिधि को भेजकर बातचीत नहीं कर सकती थी? अगर सरकार ऐसा करती, तो केंद्र की प्रतिष्ठा आम जनता की नज़र में और बढ़ जाती कि सरकार अपने युवाओं की बात भी सुनती है। वर्ष 2026 के पहले, 2024 में भी नीट परीक्षा के पेपर लीक हुए थे और कुछ छात्रों की परीक्षा फिर से करानी पड़ी थी। ऐसे में केंद्रीय शिक्षा मंत्री की कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं बनती है क्या? फिर नीट 2026 की पुनर्परीक्षा प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन में सफलता से हुई थी। अभी कुछ दिन पहले ही केंद्र को शिकायत मिलने पर मध्यप्रदेश के एक मंत्री का विभाग कुछ ही घंटों में छीन लेने से सकारात्मक संदेश ही जनता में गया है। फिर जो केंद्र सरकार अपने उपराष्ट्रपति से जुलाई 2025 में कुछ ही घंटों में ताबड़तोड़ त्यागपत्र ले सकती है, आन्दोलनकारियों की मांग पर शिक्षा मंत्री को हटाने से सही संदेश ही जाता।

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