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कब तक चलेगा ये सिलसिला…

दूरी और प्रेम के भावों के बीच खड़े दो लोग, जिनकी खामोशी अधूरी मोहब्बत और अनकहे जज़्बातों को दर्शाती है।

डॉ. किरण सरावगी

जारी रखना आसान नहीं होता,
मंज़िलें बड़ी बेरहम हो जाती हैं।

मुद्दत हुई उनसे रूबरू न हो सके,
सच है… हर बार कुसूर किसी एक का नहीं होता।

पैरों में सजते रहे घुंघरुओं की तरह,
सच है… उल्फ़त में किरदार ऐसा नहीं होता।

आओ न क़रीब इतने कि कह सकूँ बात,
दूर से तेरे होने का एहसास भी नहीं होता।

यूँ पागल बना दिया है तूने
अपनी ही चाहत में,
सच ये है…
हर बार जज़्बात वही ख़ास नहीं होता।

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