दूरी की पहली आहट

फोन हाथ में लिए खिड़की या दरवाज़े के पास खड़ी एक उदास महिला, रिश्तों में बढ़ती भावनात्मक दूरी को दर्शाता दृश्य।

रिद्धिमा की आत्मकथा से-भाग-2

सुरेश परिहार, पुणे

रिश्ते अचानक नहीं बदलते. उनमें पहले आवाज़ बदलती है, फिर आदतें, और अंत में दिल.
शुरुआत में वह मुझे बहुत सम्मान देती थी. हर बात पूछती, हर छोटी-बड़ी खुशी साझा करती. उसके शब्दों में अपनापन था और उसकी उपस्थिति मेरे दिनों का सहज हिस्सा बन गई थी. मुझे लगता था कि कुछ रिश्ते खून से नहीं, विश्वास और निरंतरता से जन्म लेते हैं.
लेकिन समय के साथ मैंने महसूस किया कि उसके व्यवहार में कुछ बदल रहा है. बदलाव इतना धीमा था कि पहले मैं उसे पहचान ही नहीं पाई. जैसे किसी कमरे की रोशनी धीरे-धीरे कम हो रही हो और आँखें अँधेरे की आदी बनने की कोशिश कर रही हों.
मैं फोन करती, तो वह बात कर लेती, लेकिन उसने खुद कभी फोन नहीं किया. शुरू में मैंने इसे उसकी व्यस्तता समझा. हर बार मन ने उसके पक्ष में दलीलें दीं. रिश्तों में प्रेम अक्सर तर्क से पहले क्षमा करना सीख जाता है.
फिर एक दिन मैंने मुस्कराकर कहा-कभी तुम भी याद कर लिया करो.
उसने सहज स्वर में जवाब दिया-मुझे फोन करने की आदत नहीं है. आपका मन करे तो आप कर लिया करो, मुझसे उम्मीद मत रखिए.
शब्द छोटे थे, लेकिन उनके पीछे छिपी दूरी बहुत बड़ी थी. कुछ वाक्य शोर नहीं करते, फिर भी भीतर बहुत कुछ तोड़ जाते हैं. उस दिन पहली बार लगा कि शायद मैं जिस जगह खड़ी हूँ, वह उसके लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं रही.
मैं मैसेज करती, तो जवाब कभी एक दिन बाद आता, कभी दो दिन बाद. कई बार पढ़कर भी जवाब नहीं आता. मैं खुद को समझाती शायद सच में व्यस्त होगी. लेकिन मन जानता था कि व्यस्तता और उदासीनता में बहुत महीन, मगर गहरा अंतर होता है.
उसके जन्मदिन पर मैंने अपने हाथों से कार्ड बनाया. उसकी पसंद का सामान खरीदा. हमेशा की तरह पूरे मन और उत्साह से उसे खुश करना चाहती थी. शायद कहीं भीतर यह उम्मीद भी थी कि भावनाएँ लौटकर आती हैं.
लेकिन जब उसने मुझे विश किया, उसके शब्दों में वह गर्माहट नहीं थी जिसकी मुझे आदत हो चुकी थी. औपचारिकता थी, पर आत्मीयता नहीं. और उसी क्षण पहली बार मेरे भीतर डर ने जन्म लिया
क्या मैं अकेली ही यह रिश्ता निभा रही हूँ?
उस प्रश्न ने मेरे भीतर एक लंबा सन्नाटा छोड़ दिया.
एक अजीब-सी बेचैनी मुझमें रहने लगी. मैं उससे इतनी जुड़ चुकी थी कि उसकी बेरुख़ी मुझे भीतर तक घायल करने लगी. शिकायतें थीं, लेकिन उनसे कहीं अधिक डर था उसे खो देने का डर, या शायद यह स्वीकार करने का डर कि वह पहले ही दूर जा चुकी है.
मैं खुद को समझाती रहती. शायद मैं ज़रूरत से ज़्यादा सोच रही हूँ शायद यह मेरा वहम है.लेकिन सच यह था कि दिल अक्सर वह देख लेता है, जिसे आँखें स्वीकार नहीं करना चाहतीं.
धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि वह अपने चारों ओर एक अदृश्य दीवार खड़ी कर रही है. उसके शब्द अब मेरे पास आते थे, पर उसके भाव नहीं. बातचीत होती थी, पर संवाद नहीं. रिश्ता बचा हुआ था, लेकिन उसकी धड़कन कहीं धीमी पड़ चुकी थी.
और मैं
मैं अब भी उसी पुराने दरवाज़े पर खड़ी थी.हाथों में विश्वास लिए….आँखों में प्रतीक्षा लिए…इस उम्मीद के साथ कि एक दिन वह फिर पहले जैसी हो जाएगी. लेकिन जीवन ने धीरे से एक कठोर सत्य सिखाया.

कुछ दरवाज़े आवाज़ करके बंद नहीं होते,वे बस भीतर से बंद हो जाते हैं
और हमें बहुत देर बाद पता चलता है कि हम कब से बाहर खड़े हैं.

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