मृणालिनी

ट्रैफिक सिग्नल पर कार में बैठी उदास मृणालिनी और पास की कार में उसे देखते डॉक्टर मृगांक का भावनात्मक दृश्य।

देवश्री गोयल, जगदलपुर

मृणालिनी आज वह करने निकली थी, जो उसके बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था।

45 से 50 वर्ष के बीच की मृणालिनी बेहद खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व की धनी थी। एक अच्छी-खासी नौकरी, एक बेटे की मां—सब कुछ बेहद अच्छा था। पति सारांश भी किसी कंपनी में ऊंचे पद पर थे। मृणालिनी को जानने वाले उसे बेहद खुशकिस्मत मानते थे।

लेकिन ऊपर से शांत दिखने वाला सागर भीतर कितनी हलचल समेटे होता है, यह सागर ही जानता है।

मृणालिनी केवल सुंदर ही नहीं थी, बल्कि अत्यंत सुघड़ एवं उच्च आदर्शों वाली स्त्री थी।

समय के साथ सब अच्छा ही चल रहा था, तभी मृणालिनी को अपने पति के बारे में कुछ ऐसा सच पता चला कि उसका अस्तित्व छिन्न-भिन्न हो गया।

शिकायत करने पर घर में क्लेश बढ़ने लगा। 11–12 वर्ष का उनका बेटा भी इन सब से प्रभावित हो रहा था। इसलिए मृणालिनी ने खुद को समझा लिया कि अब ऐसे ही जीना और चलना है। तलाक के बारे में सोचना भी उसके लिए पाप था।

ऐसे ही दिन बीत रहे थे।

आज मृणालिनी क्रॉसिंग पर अपनी कार में सिग्नल क्लियर होने का इंतजार कर रही थी। एकांत हर उस व्यक्ति का पसंदीदा क्षण होता है, जो या तो प्रेम में हो या विरह में। पति की बेवफाई से टूटी मृणालिनी अकेली होते ही अतीत के पन्ने पलटने लगी।

तभी बगल में एक कार आकर रुकी। मृणालिनी की आंखों में आंसू थे, वह रो रही थी।

बगल की कार में बैठे एक दरम्यानी उम्र के व्यक्ति, मृगांक, की नजर मृणालिनी पर पड़ी। एक खूबसूरत स्त्री को रोते देख वह द्रवित भाव से उसे देख रहा था। अचानक मृणालिनी ने भी नोटिस किया कि कोई उसे देख रहा है, तो हड़बड़ाकर उसने अपनी आंखें पोंछ लीं।

मृगांक ने आंखों के इशारे से पूछा—क्या हुआ, सब ठीक है?

किसी अजनबी का यूं इशारा करना मृणालिनी को नागवार गुजरा। वह दूसरी तरफ मुंह करके देखने लगी।

तभी सिग्नल हरा हो गया और कार झटके से आगे बढ़ गई।

दोनों की गाड़ियां अपने-अपने गंतव्य की ओर निकल गईं।

नियति जब जिसे मिलाना चाहती है, वह मिल ही जाते हैं।

लगभग रोज ही वे दोनों आमने-सामने होते। न कोई संवाद, न कोई बातचीत।

मृगांक का रोज इशारों में पूछना—तुम ठीक हो?
और मृणालिनी का गर्दन झुका लेना।

बस, इतना ही परिचय था।

एक दिन धारासार बारिश हो रही थी। मृणालिनी के बेटे की तबीयत खराब थी और वह उसे डॉक्टर के पास लेकर जा रही थी। नंबर आने पर जैसे ही वह बच्चे को लेकर केबिन में दाखिल हुई, वह चौंक उठी।

सामने डॉक्टर के रूप में मृगांक थे।

वह भी चौंक गया, लेकिन भीतर एक सुखद अनुभूति का आभास होने लगा।

मृगांक ने बच्चे का बहुत अच्छे से इलाज किया। मृणालिनी एकदम मुग्ध भाव से उसे अपने बेटे का इलाज करते देख रही थी और सोच रही थी—काश, मेरे पति भी मेरे बेटे के साथ इतना ही प्यार से व्यवहार करते।

मृगांक ने मृणालिनी से उसके बारे में दो-चार बातें पूछीं। उसने भी हां-हूं में जवाब दिया और घर चली गई।

काफी रात बीत चुकी थी। सारांश का इंतजार करना बेमानी है—यह सोचकर उसका मन भारी हो गया। तभी मोबाइल की घंटी बज उठी।

नाम देखकर वह चौंकी—

“डॉक्टर साहब”

कुछ सोचते और झिझकते हुए उसने फोन उठाया।

“हेलो मैम, नमस्कार। मैं आपके बेटे का डॉक्टर मृगांक बोल रहा हूं। पहचाना न?”

“जी…”

बेहद झिझकते हुए उसने कहा।

मृणालिनी सोच ही रही थी कि इतनी रात गए फोन करने का कारण क्या हो सकता है कि उधर से आवाज आई—

“माफ कीजिएगा, मुझे इतनी देर रात फोन नहीं करना चाहिए था, लेकिन आपके बेटे की रिपोर्ट के बारे में कुछ कहना था। अगर आप कल अस्पताल आ सकें तो अच्छा होगा। और हो सके तो अपने श्रीमान जी के साथ आइए।”

मृणालिनी घबरा गई—

“कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है मेरे बच्चे को?”

“नहीं-नहीं, वह शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ है, लेकिन फिर भी आप आइए, कुछ जरूरी बात करनी है।”

“जी…”

कहकर उसने फोन रख दिया।

सुबह जब उसकी नींद खुली, तो उसने अपने पति से कुछ कहना चाहा, लेकिन अकारण ही बहस शुरू हो गई और वह बच्चे की बात कह ही नहीं पाई।

दोपहर में वह अकेली ही डॉक्टर से मिलने चली गई।

उसे अकेला देखकर मृगांक ने उसके पति के बारे में पूछा। मृणालिनी ने बहाना बना दिया। कुछ देर की बातचीत में मृगांक समझ गया कि वह पति से परेशान स्त्री है, जो अपनी शादी बचाने की कोशिश करते हुए बहुत कुछ सह रही है।

बच्चे के बारे में आवश्यक निर्देश देकर उसने मृणालिनी को विदा किया।

लेकिन दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर बन चुका था। मृणालिनी और डॉक्टर साहब के बीच औपचारिक बातचीत कब खत्म हो गई, दोनों को पता ही नहीं चला। दोनों एक-दूसरे के मोहपाश में बंधते चले जा रहे थे।

समय बीतता जा रहा था।

मृणालिनी मध्यमवर्गीय परिवार से थी, जहां मर्यादा, लोकलाज और संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं। जब से मृगांक उसकी जिंदगी में आए थे, वह पति की तरफ से कुछ बेपरवाह-सी हो गई थी। लेकिन जब अपनी वर्तमान स्थिति को देखती, तो मन ग्लानि से भर उठता। उसका मन दिन-रात इसी कशमकश में उलझा रहता कि वह आखिर कहां और किस दिशा में जा रही है।

एक दिन वह बीमार पड़ गई।

मृगांक उसके फोन और चैट का इंतजार कर रहे थे, लेकिन जब दोपहर तक मृणालिनी की कोई खबर नहीं मिली, तो वे चिंतित हो उठे और उसके घर की तरफ निकल पड़े।

इन एक सालों में वे कभी भी मृणालिनी के घर नहीं गए थे, न ही कभी एकांत में मिले थे। इसलिए हिचक और घबराहट दोनों डॉक्टर साहब के मन में थीं।

थोड़ी देर में वे उसके घर के बाहर थे। उन्होंने कॉल किया, लेकिन फोन स्विच ऑफ बता रहा था। घर में ताला नहीं लगा था, मगर यह संभावना भी थी कि उसके पति घर पर हों।

करीब दस मिनट सोच-विचार करने के बाद मृगांक ने डोरबेल बजा दी।

एक-दो घंटियों के बाद दरवाजा खुला।

सामने मृणालिनी खड़ी थी।

सूजी हुई आंखें, लाल चेहरा।

मृगांक को यूं सामने देखकर वह भी हैरान रह गई।

उसे देखते ही डॉक्टर ने पूछा—

“ये क्या हाल बना रखा है? सुबह से न कोई फोन, न कोई खबर!”

“मेरी तबीयत खराब हो गई थी… इसलिए बात नहीं की…”

इतना कहते-कहते उसे चक्कर आया। डॉक्टर ने तुरंत उसे संभाल लिया।

छूते ही बोले—

“तुम्हें तो तेज बुखार है। कुछ खाया है? कोई दवा ली?”

लेकिन जवाब देने की हालत उसमें नहीं थी और वह सोफे पर ही लुढ़क गई।

मृगांक की हालत खराब हो गई। घर में कोई नहीं था। उन्होंने उसे संभालकर बेडरूम तक पहुंचाया।

अर्ध-बेहोशी में मृणालिनी ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया था।

जिसे वह इतना चाहते थे, वह आज उनके इतने करीब थी। उसकी गर्म सांसों की भाप से मृगांक का मन डगमगाने लगा, लेकिन उन्होंने खुद पर काबू रखा और धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरते रहे।

कुछ देर बाद मृणालिनी ने आंखें खोलीं।

अपने प्रेम को इतने समीप देखकर वह भी व्याकुल हो उठी और उसकी आंखों में आंसू आ गए।

मृगांक उसके आंसू देखकर तड़प उठे। कुछ बोले नहीं, बस उसे अपने सीने से लगा लिया।

कुछ देर के लिए सब भूलकर मृणालिनी भी उनके सीने पर सिर रखकर रोती रही।

फिर थोड़ी देर बाद वह संभलकर बैठ गई।

मृगांक उसे दवाइयां देकर निकलने ही वाले थे कि तभी मृणालिनी का बेटा आ गया।

डॉक्टर को वह पहचानता था।

दो-चार मिनट उससे बात करके मृगांक बेमन से वहां से चले गए—ढेर सारी हिदायतें देकर और फिर आने का वादा करके।

देर रात जब सारांश घर आए, तब भी मृणालिनी बिस्तर पर ही पड़ी थी।

सारांश का माथा खराब हो गया। वह चीखने लगे—

“तुम सारा दिन सोई हुई हो! कम से कम खाना तो बना लेती!”

“पापा… मम्मी को बहुत बुखार है…” बेटा बोल पड़ा।

“बुखार तो बहाना है इनका!”

बड़बड़ाते हुए वह कमरे से निकल गए।

मृणालिनी बेहद दुखी हो गई।

कम से कम यह तो पूछ लेते कि उसे कैसा लग रहा है, उसने कुछ खाया या नहीं।

बेटे ने तो खुद ही मैगी बनाकर खा ली थी।

रात भूखी, प्यासी और दर्द में कट गई।

सुबह जब उसकी नींद खुली, तो सारांश जा चुके थे।

वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। भयंकर भूख और दर्द से उसका हाल बेहाल था। बेटा भी अभी तक सोकर नहीं उठा था।

किसी तरह उसने खुद को संभाला, बेटे को उठाया, सब्जी-पराठा बनाया और कुछ कपड़ों के साथ बेटे को लेकर घर से निकल गई।

वह गाड़ी में बैठ ही रही थी कि मृगांक का फोन आ गया।

उसने सिर्फ इतना कहा—

“मैं क्लिनिक आ रही हूं…”

जब उसने मृगांक को बताया कि उसने घर छोड़ने का फैसला कर लिया है, तो एक बारगी वह चौंक गए।

फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—

“अगर तुम चाहो, तो मेरे दिल के बाद मेरे घर में भी तुम्हारा स्वागत है।”

मृणालिनी ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप सोचती रही।

मृगांक अच्छे डॉक्टर होने के साथ-साथ एक अच्छे इंसान भी थे।

वे उन दोनों को सीधे अपने घर न ले जाकर एक होटल में ले गए।

मृणालिनी चौंकी—

“हम यहां क्यों आए हैं?”

“पहले भोजन कर लेते हैं, फिर बताता हूं।”

उन्होंने बच्चे को मोबाइल में व्यस्त कर दिया।

फिर बोले—

“मृणाल, सुनो… तुम अगर मेरी जिंदगी में आती हो, तो यह मेरा सौभाग्य होगा। लेकिन अभी तुम मुझे ठीक से जानती भी नहीं हो। कहीं घर छोड़ने का फैसला जल्दबाजी न हो जाए।”

मृणालिनी को एकदम क्रोध आ गया।

“व्यर्थ ही तुम पर भरोसा किया मैंने!”

कहकर वह उठने लगी।

मृगांक ने उसका हाथ थाम लिया—

“अरे, नाराज मत हो… प्लीज़। पहले तुम खुद मानसिक रूप से तैयार हो जाओ। मेरा घर तुम्हारे लिए हमेशा खुला है।”

मृणालिनी कुछ समझ नहीं पा रही थी।

इतने में भोजन आ गया।

तीनों ने साथ बैठकर खाना खाया।

भोजन के बाद भी वह चुपचाप बैठी रही।

मृगांक बिल चुकाने ही वाले थे कि अचानक मृणालिनी की नजर सामने पड़ी।

वह सन्न रह गई।

सामने सारांश थे।

उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

उनके साथ एक औरत थी, जो बेहद बदतमीजी से पेश आ रही थी। शायद वही औरत थी, जिसके साथ उनका संबंध था।

दूर से ही मृगांक समझ गए कि वह सारांश हैं।

उन्होंने इशारे से मृणालिनी को दूसरी तरफ से बाहर निकलने को कहा।

बेटे को भी समझाया—

“पापा को आवाज नहीं देना… चुपचाप बाहर चलते हैं।”

बच्चे अक्सर नाजुक परिस्थितियों को समझ जाते हैं।

गाड़ी में बैठते ही मृणालिनी बोली—

“प्लीज़… मुझे मेरे घर छोड़ दीजिए, डॉक्टर साहब।”

मृगांक मंद-मंद मुस्कुरा दिए।

उन्होंने कुछ नहीं कहा।

दो वर्ष पहले एक महिला डॉक्टर के साथ अफेयर के शक में मृगांक की पत्नी उन्हें यूं ही छोड़कर चली गई थी। बाद में उसके साथ एक बेहद दर्दनाक हादसा हुआ और वह अब जेल में थी।

लेकिन यह सब मृगांक ने कभी मृणालिनी से नहीं कहा था।

घर के सामने पहुंचकर उन्होंने कहा—

“हम सदा स्वस्थ दोस्त रहेंगे… लेकिन मैं तुम्हें अपना घर तोड़ने की सलाह नहीं दे सकता।”

और वह चले गए।

मृणालिनी उन्हें जाते हुए देखती रही।

उसके मन का बहुत-सा गुबार जैसे निकल चुका था।

वह हल्का-सा मुस्कुराई… और अपने घर के भीतर चली गई।

6 thoughts on “मृणालिनी

  1. मेरी कहानी घर वापसी को प्रकाशित करने के लिए श्री सुरेश जी आपको हृदय से आभार 🙏🙏🙏🙏

    1. बहुत ही भावपूर्ण कहानी स्त्री मृणालिनी की अपने पति के बेरूखी जूझती हुई 👌👌👌
      बहुत ही खूबसूरत लेखन ✍️✍️✍️

  2. This is a very interesting story. It feels like someone’s true story. You write very well, sister-in-law.

  3. बहुत अच्छी कहानी है और एक महिला के अंतर्मन के भावों की अभिव्यक्ति भी बहुत सुंदर 👌👌👏👏❣️

  4. अच्छी लगी कहानी। इसका विस्तार भी कर सकती हैं लेखिका। रोचकता से भरपूर लेखन की हार्दिक बधाई!

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