खामोशी

दो भारतीय महिलाओं के बीच अविश्वास और भावनात्मक दूरी को दर्शाता यथार्थवादी दृश्य, टूटा भरोसा और रिश्तों की खामोशी।

रिद्धिमा की आत्मकथा से {भाग-3)

सुरेश परिहार, पुणे

कभी-कभी रिश्ते प्रेम की कमी से नहीं, भरोसे की मौत से खत्म होते हैं. एक रिश्ता तब सबसे ज्यादा दुख देता है, जब उसमें प्रेम अब भी बचा हो लेकिन भरोसा धीरे-धीरे दम तोड़ चुका हो.
हमारा रिश्ता कोई नया नहीं था. आठ-नौ साल की पहचान थी. इतनी कि औपचारिकता की दीवारें कब गिर गईं, याद भी नहीं. वह जब मेरे घर आती, तो मैं उसे मेहमान नहीं मानती थी. अलमारी की चाबी तक उसके सामने रख देती. उसकी पसंद की सब्ज़ी बनती, चाय उसी तरह बनती जैसी उसे पसंद थी. मैं उसे बेटी, बहन और दोस्ततीनों के बीच कहीं रखती थी. मुझे लगता था रिश्ते ऐसे ही होते हैंजहाँ हिसाब नहीं, अपनापन रहता है. शायद इसी भरोसे के कारण जब उसने मुझे एक हफ्ते के लिए अपने घर बुलाया, तो मैं बिना किसी संकोच के चली गई. लेकिन वहाँ पहुँचकर मैंने उसके भीतर का एक दूसरा संसार देखा.
वह अपने सामान को लेकर असामान्य रूप से सतर्क रहती थी. पर्स हमेशा अपने पास, अलमारी पर नजर, चीज़ों की बार-बार गिनती. शुरू में मैंने इसे उसकी आदत समझा. हर इंसान का स्वभाव अलग होता हैयही सोचकर मैंने कभी मन में सवाल नहीं उठाया.
फिर वह दिन आया जिसने हमारे रिश्ते के भीतर एक महीन दरार डाल दी. वह बाहर गई हुई थी और मैं कमरे में बैठकर फोन देख रही थी. तभी याद आया कि वॉशिंग मशीन में कपड़े पड़े हैं. मैं जल्दी-जल्दी कपड़े निकालकर खिड़की पर सुखाने लगी. शायद उसी समय वह लौट आई थी और उसने मुझे खिड़की से देखा.उस पल मुझे कुछ भी असामान्य नहीं लगा.
लेकिन शाम को उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी कठोरता थी. उसने अचानक पूछा-क्या आपने मेरा पर्स या सामान देखा था?सवाल छोटा था, पर उसके भीतर छिपा अर्थ बहुत बड़ा.एक पल के लिए लगा जैसे किसी ने भीतर से जमीन खींच ली हो.
मैंने शांत रहने की कोशिश की और कहा-नहीं और बिना पूछे किसी का सामान छूना मेरी आदत भी नहीं है. मैंने सोचा बात वहीं खत्म हो जाएगी. लेकिन उसकी आँखों में जो था, वह सवाल से कहीं ज्यादा तकलीफदेह था. अविश्वास.
वह मुझे सुन तो रही थी, पर मान नहीं रही थी.
उस रात घर वही था, कमरे वही थे, लेकिन मेरे लिए सब बदल गया. पहली बार मुझे अपने ही रिश्ते में अजनबी होने का एहसास हुआ.अगले दिन उसकी दूरी और साफ थी. बात कम, नज़रें बचाकर जवाब, और बीच में एक अदृश्य दीवार.
आख़िर मैं टूट गई. मैंने उससे पूछा-क्या तुम्हें सच में लगता है कि मैं तुम्हारा सामान चेक करूँगी?
मेरी आवाज़ में शिकायत कम, दर्द ज्यादा था.मैंने बच्चों की कसम तक खाई. शायद इसलिए नहीं कि मैं निर्दोष साबित होना चाहती थी, बल्कि इसलिए कि जिस रिश्ते को मैं अपना घर समझती थी, उसके सामने खुद को कटघरे में खड़ा नहीं देख पा रही थी.
लेकिन कुछ नहीं बदला.तब मुझे पहली बार समझ आया.सफाई वहाँ दी जाती है, जहाँ विश्वास बचा हो. जहाँ भरोसा मर जाए, वहाँ शब्द भी बेबस हो जाते हैं.उस घटना के बाद हमारा रिश्ता ऊपर से सामान्य दिखता रहा, लेकिन भीतर कुछ टूट चुका था. बातचीत कम होने लगी. पहले जहाँ छोटी-छोटी बातें साझा होती थीं, अब सिर्फ औपचारिक संदेश रह गए. कभी जो घंटों की बातचीत होती थी, वह ठीक हूँ तक सिमट गई.फिर 2019 में उसके बेटे का जन्म हुआ.
मैं गिफ्ट लेकर गई. दिल में कहीं उम्मीद थी कि शायद पुराने दिन लौट आएँगे. शायद बच्चे की मुस्कान हमारे बीच की बर्फ पिघला दे.
लेकिन वहाँ जाकर समझ आया कि कुछ दरवाजे बंद हो जाने के बाद सिर्फ खुले दिखाई देते हैं.उसने कोई कटु बात नहीं कही, लेकिन व्यवहार में वह गर्माहट नहीं थी जो कभी मुझे अपना होने का एहसास देती थी. मैं बैठी रही, मुस्कुराती रही, लेकिन भीतर एक अजीब खालीपन उतरता गया.लौटते समय हाथ खाली नहीं थे. दर्द साथ था.
फिर कोविड आया…
दो साल हम बात नहीं कर पाए.और उन्हीं दो सालों में मुझे समझ आया कि कुछ लोग जब जीवन से दूर जाते हैं, तो उनकी अनुपस्थिति शोर नहीं करतीबस भीतर एक कमरा खाली छोड़ जाती है. कभी बाजार में उसकी पसंद का शैम्पू दिख जाता तो कदम ठहर जाते. किसी की आवाज़ उसकी याद दिला देती. कुछ खुशबुएँ थीं जो अब भी उसे साथ लेकर आती थीं. मैंने कई बार फोन उठाया, नंबर देखा फिर वापस रख दिया.अहंकार नहीं था. बस डर था. कहीं दूसरी तरफ अब भी वही शक ज़िंदा हुआ तो? लोग कहते हैं पुरानी दोस्तियाँ उम्रभर चलती हैं.लेकिन मैंने सीखा-समय रिश्तों को लंबा ज़रूर कर देता है,
गहरा नहीं.और शायद सबसे कठिन सच यह है
रिश्ते अचानक नहीं टूटते. वे पहले भरोसा खोते हैं, फिर शब्द,और आखिर में सिर्फ याद बनकर रह जाते हैं.

One thought on “खामोशी

  1. बहुत ही भाव पूर्ण कहानी है कथावस्तु बहुत ही सुगठित है हार्दिक बधाई आपको

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