स्वावलंबन

स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का प्रतीक एक युवा व्यक्ति, जो उगते सूरज के बीच आत्मविश्वास के साथ अपनी राह पर खड़ा है

खुद से खुद का रास्ता -तू खुद अपना भाग्य विधाता

डॉ. संगीता पांडेय, पुणे

मैं क्यों ढूंढूं कोई कंधा,
जब मेरे पास भी बाहें हैं?
दूसरों के पैरों से चलकर
किसने पाई राहें हैं?

भ्रम का यह कुहासा तोड़,
खुद पर तू विश्वास जगा,
पराए दियों की रोशनी से
कब दूर हुआ अपना अंधेरा भला?

न बन तू मोहताज किसी का,
न कर बैसाखियों की आस,
तेरे भीतर ही छिपा हुआ है
असीम शक्तियों का आकाश।

गिरेगा, संभलेगा,
फिर से तू खड़ा हो जाएगा,
जब तक खुद पर भरोसा है,
तू हर मंज़िल को पाएगा।

भाग्य के भरोसे बैठने वाले
अक्सर पीछे छूट जाते हैं,
जो खुद अपनी पतवार संभालें,
वे लहरों को भी मोड़ लाते हैं।

अपनी मेहनत की स्याही से
अपनी किस्मत का लेख लिखो,
औरों के सहारे जीने से बेहतर,
खुद के दम पर लड़ना सीखो।

उठ, पहचान अपनी ताकत को,
तू खुद में एक समंदर है,
बाहर क्या तलाशता है पगले,
जीत का रास्ता तेरे अंदर है।

तू खुद अपना भाग्य-विधाता,
खुद ही अपनी ढाल बन,
आत्मनिर्भरता के इस पथ पर
तू खुद अपनी मिसाल बन!


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