
सत्यनारायण गाडोलिया, राष्ट्रीय संगठन मंत्री” चित्तौड़ (राजस्थान)
आज शमशान में खड़ा हुआ हूँ।
मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी का शरीर जल रहा है।
आज से 50 वर्षों पहले मेरा और मेरी पत्नी का गठबंधन यानी शादी-विवाह हुआ।शादी होते ही कुछ दिनों के अंतराल के बाद ही मुझे मेरी पत्नी ने मेरे अपनों से अलग कर दिया।मेरे माता-पिता, मेरे भाई-बहन सभी साथ में रहे थे और एक दूसरे के साथ खाना और जीवन के अच्छे पल बिता रहे थे। शादी हो गई और पत्नी ने इन सबको छोड़ दिया। मैं उसे रास्ते पर ले गया, जहाँ केवल मेरी पत्नी और मैं ही थे।
कुछ दिनों के बाद पत्नी ने पुत्र दिया हम तीन हो गए। एक और पुत्र हुआ हम चार हो गए।कुछ दिनों के बाद एक और बेटी का जन्म हुआ हम पांच हो गए। सभी हंसते-मुस्कुराते परिवार में साथ रह रहे थे, बच्चों की शिक्षा जारी थी। समय के साथ बच्चे बड़े हो गए, सभी अपने-अपने व्यवसाय एवं नौकरियों में लग गए। हमने भी उनकी शादियाँ करवा दी। कुछ समय के लिए परिवार बड़ा हो गया।
दो बहुएँ घर में आ गईं, बेटी ससुराल चली गई।समय चक्र चलता रहता है। वह दिन फिर वापस आ गया।बेटे और बहू दोनों ही अलग-अलग जगह चले गए, अपने आशियाने में।जिस प्रकार हमने अपने माता-पिता को छोड़ा था, उसी प्रकार आज वे हमें छोड़कर चले गए।हम दोनों पति-पत्नी वापस अकेले रह गए। पत्नी ने मेरी तरफ देखा, आँसू आ रहे थे उसकी आँखों में।
आज वह पीड़ा जो उसको हो रही है, यदि वह दिन हमारी माता के आँसुओं को देख पाती और समझ पाती, तो हम अकेले नहीं होते, न पहले होते, न ही आज होते। किंतु यह संसार का चक्र है। युगों-युगों से ऐसा होता आया है।कर्म अनुसार जीवन संचालित होता है। जैसा हम बोएँगे, वैसा काटना भी पड़ेगा।पत्नी कुछ दिनों के बाद बीमार रहने लगी। हॉस्पिटलों में इलाज करवाया गया।
औपचारिकता निभाने के लिए बच्चे और बहुएँ मिलने के लिए आईं और वापस चली गईं।बच्चों को समय नहीं था, छुट्टियाँ नहीं थीं। मैं अकेला पत्नी का ख्याल रखता रहा। और वह दिन भी आ गया . वह हमें छोड़कर इस संसार से विदा हो गई।
आज शमशान में उसका अंतिम संस्कार हो रहा है। मैं असहाय सा देख रहा हूँ। कुदरत के करिश्मा को देखता हूँ — 50 वर्षों में कितनी बार अकेला रहा। क्या यही संसार है?आज के बाद तो जब तक जीवन है, मुझे अकेला ही रहना है। चाहे घर पर रहूँ, चाहे वृद्धाश्रम में समय व्यतीत करना ही पड़े। क्योंकि यहाँ कोई किसी का नहीं है, होगा भी कैसे?हम किसी के नहीं रहे, कोई हमारा कैसे होगा? हमारे पूर्वज गृहस्थ जीवन की बहुत अच्छी व्यवस्था करते थे।संयुक्त परिवार की जो व्यवस्थाएँ थीं, उनमें व्यक्ति कभी भी अकेला नहीं होता था। एक-दूसरे के साथी हमेशा रहते थे। क्या हमारी शिक्षा हमारे जीवन के लिए दुखद स्थिति तो पैदा नहीं कर रही? चिंतन करने की जरूरत है। चिंता करने की जरूरत है।

भावुक लेकिन सत्य
कटुसाथ्य
जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे, यहीं संसार का नियम है, कहते हैं बबूल के पेड़ पर आम नहीं लगते यहीं शास्वत सत्य है इसलिए समय रहते चेत जाना चाहिए
आज का कटु सत्य
कोई जवान सन्युक्त परिवार में आस्था नहीं रखता । इसका फल बुढ़ापे का अकेलापन ही है ।
अगर बच्चे अपने माता – पिता को दादा- दादी का ख्याल करते देखते हैं तो वे भी एसा ही करते हैं ।
इस सत्य का चिन्तन-मनन बहुत आवश्यक है ।
Yeh Jeevan hai.es saachaee ko koi nakaar nahin sakta.Thought Provoking