
डॉ. उर्मिला सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका
वैसे डाकिया हमारे जीवन के अभिन्न अंग थे, पारिवारिक सदस्य से भी बढ़कर। जबकि वे हमारे साथ नहीं रहते थे, लेकिन अपनों का प्यार भरा संदेशा तो लाते थे, जो हमसे कोसों दूर रहते थे।
“डाकिया” शब्द सुनते ही आज से कुछ वर्षों पहले का दृश्य आँखों के समक्ष नाच उठा। खाकी ड्रेस में, मंझोले कद के सांवला वर्ण जो अब धूप में घूमने से ताम्बई हो गया था, तीखी नासिका, गड्ढे में घुसी मिचमिचाती आँखें, सिर पर टोपी, कानों के ऊपर चश्मा; प्राय: टूटे हुए चश्मे की कमानी धागे से बंधी होती। निर्विकार प्राणी हमारे डाक चाचा!
कड़ाके की सर्दी या तपती गर्मी, आंधी, पानी, तूफान कोई भी मौसम हो, अगर कोई खत, पार्सल, तार या मनीऑर्डर है तो उन्हें आना ही है।
वे जब भी आते नीरव दोपहरिया में, उनके साइकिल की खड़खड़ाहट, घंटी का टन-टन, उनके आने की सूचना पहले ही दे देता। लोगों के दिलों की धड़कन बढ़ जाती। इंतजार की घड़ियाँ कितनी लंबी और कलेजा कंपकंपाने वाली होती हैं, उस वक्त पता चलता। डाक चाचा हमारी ओर बुधवार और शनिवार को आते थे।
कितनी उत्सुक निगाहें, धड़कता दिल उनकी प्रतीक्षा में, पलक पाँवड़े बिछाए…! वे भी जिसकी चिट्ठी या जो भी होता, उसके मकान के सामने साइकिल खड़ी कर आवाज़ लगाते “चिट्ठी… मनीऑर्डर… तार… पार्सल…!”
घरवाले लपककर निकलते “हाँ डाक-बाबू…।” वे किसी के चाचा थे, किसी के भैया और बुजुर्गों के डाक दुलरूवा…!
नवविवाहिताएँ अगर ससुराल में होतीं, तो नैहर की चिट्ठी और मायके की चिट्ठी का बेसब्री से इंतजार करतीं। घर के बुजुर्ग उन्हें बुला उनकी अमानत थमाते, और वे पत्र को आंचल में छुपाकर अपने कमरे में भागतीं। उन दिनों बिजली का प्रवेश हमारे जीवन में नहीं हुआ था; अतः मिट्टी के घर प्रायः अंधेरे ही रहते थे। किन्तु युवा आँखों में तेज़ रोशनी थी और दिल में जज़्बात… चिट्ठी से आधी मुलाकात होती।
कोई मुस्कुराती, कोई सिसकती, और अगले पत्र का इंतजार करतीं…! कई-कई बार पत्र पढ़े जाते। अपने नाज़ुक हाथों से डाक-बाबू के लिए मीठे गुड़ के शरबत, छाछ या पालतू भैंस, गाय के दूध की चाय बनाकर पिलाती।
गांव-गांव घूमते डाक-बाबू धन्य हो जाते, जी जुड़ जाता “जीती रहो बिटिया…!”
“मालिक का इक़बाल बना रहे…” और आगे बढ़ जाते।
उन दिनों लिफ़ाफ़े, अन्तर्देशीय, पोस्टकार्ड पर चिट्ठी लिखी जाती। कभी-कभी बैरंग पत्र भी, जिसमें टिकट नहीं लगता था, और वह जरूर पहुंचता, क्योंकि उसके दुगुने पैसे पाने वाले को दण्ड स्वरूप देना होता था।
पार्सल से कपड़े, जरूरी सामान मंगाए जाते, तीज-त्यौहार में। जो स्वयं नहीं आ सकता था, वह डाक का सहारा लेता — सुरक्षित, सर्वसुलभ। पार्सल, मनीऑर्डर और शुभ संदेश लाने पर प्राप्तकर्ता स्वेच्छा से डाक-बाबू को बख़शीश देते, जिसे वे प्रसाद के समान ग्रहण करते। आपस में सभी का बेहद अद्भुत, मनोरम रिश्ता था।
उन दिनों हम बच्चे आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले फ़िल्मी गीतों के लिए पोस्टकार्ड पर अपना, मित्रों और गांव का नाम लिखकर लाल रंग से रंगा पत्रपेटी में डालते और रेडियो पर अपना नाम सुनकर खुश होते। वैसी प्रसन्नता आज तमाम उपलब्धियों पर भी नहीं होती।
फिर हम बड़े हुए। स्वलिखित कथा, कहानी, लेख लिफ़ाफ़े में भरकर डाक टिकट लगा भेजने लगे। पुस्तक, स्वीकृति, अस्वीकृति, पारिश्रमिक डाक चाचा लाते और हमें ढेरों आशीर्वाद देते।
“बिटिया, खूब पढ़ो-लिखो, गांव-जवार, बाप-दादा का नाम रौशन करो…” डाक चाचा का आशीर्वाद हमारे सिर पर होता और हम झुककर उनका पांव छू लेते।
डाक चाचा हमारे लिए किसी देवदूत, सांता क्लॉज़, फ़रिश्ते से कम नहीं थे… जो हमारे मनोवांछित, चिरप्रतीक्षित संदेशों को दूर देश से अपने भूरे रंग के घिसे हुए थैले से निकालकर पकड़ाते। पाने वाले के हर्ष पारावार नहीं रहता।
लाखों दुआएँ डाक चाचा के लिए निकलती “जल्दी संवाद लाना…”!
डाक चाचा होंठों में मुस्कुराते। अब उन्हें कौन समझाए, “कि जब कोई भेजेगा तभी तो ला पाऊँगा…!”
“ज़रूर” वह साइकिल पर यह जा… वह जा!
नया अनाज हो, ताजा सब्ज़ियाँ, फल, दूध-दही, घी, पकवान ग्रामीण अपनी ओर से उन्हें अवश्य भेंट करते। चाचा के पास भी अतिरिक्त थैला रहता, जिसमें उपहार वे खुशी-खुशी अपने घर ले जाते।
ज़रूरतमंदों के मनुहार पर शहर से छोटा-बड़ा सामान, दवा भी ला देते। सहर्ष सुख-दुख, छठी जि़ला में शरीक होते।
वे हर दिल के अघोषित हमराज़, सखा थे।अब न वह ग्रामीण जीवन रहा, न डाक के प्रति आकर्षण। क्योंकि अब सब-कुछ फ़ोन, मोबाइल और इंटरनेट/सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। एक ही खबर कई प्रकार से सोशल मीडिया पर छाई रहती है, जिससे उकताहट सी होती है .वह कौतूहल, वह आकर्षण पैदा नहीं होता जो हाथ से लिखी चिट्ठी और चाचा के प्यारे बोल से प्राप्त होता था।

आपने उसे गुजरे जमाने को एक बार जीवंत कर दिया। पूरा दृश्य जैसे आंखों के आगे आकर खड़ा हो गया है।
डाक चाचा पर सच्चाई पर आधारित एक सुन्दर निबन्ध । आंखों के सामने एक फिल्म की तरह घूम रहा है । उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी बहुत से लोगों की बातों को गुप्त रखना ।
किसी बिटिया को लिखना ना आए तो डाक चाचा उसके मन की बात भी लिख डालते थे , इस समझदारी के त्रिकोण पर कभी भी शक या झगड़ा नहीं सुना ।
आपको सुंदर लेख की ढेर बधाई उर्मिला जी ।