200 साल पहले एक भारतीय ने दुनिया को दिया ‘शैम्पू’ शब्द

पटना से ब्रिटेन तक: 200 साल पहले एक भारतीय ने दुनिया को दिया ‘शैम्पू’ शब्द भारतीय ने ब्रिटेन में शैम्पू शुरू किया AI IMAGE

पटना के साके डीन महोमद ने 1814 में ब्रिटेन में ‘चांपी’ को ‘शैम्पू’ बनाया

सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

ब्राइटन/लंदन।
आज बाथरूम में रखी शैम्पू की बोतल एक आम चीज़ है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शब्द और इसकी शुरुआत के पीछे एक भारतीय का हाथ है? 19वीं सदी में पटना के रहने वाले शेख दीन मोहम्मद ने न सिर्फ ब्रिटेन में भारतीय मसाज थेरेपी को लोकप्रिय बनाया, बल्कि अंग्रेजी भाषा को ‘शैम्पू’ जैसा शब्द भी दिया।

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक प्रभाव की है जिसने पश्चिमी दुनिया की लाइफस्टाइल को बदल दिया।

जब ‘चांपी’ बनी ‘शैम्पू’

ब्राइटन के समुद्र तट पर शेख दीन मोहम्मद ने एक बाथहाउस शुरू किया, जहां वे भारतीय शैली की सिर की मालिश ‘चांपी’ करते थे। अंग्रेजों के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। धीरे-धीरे ‘चांपी’ शब्द अंग्रेजी में ‘शैम्पू’ बन गया और आज यह पूरी दुनिया में इस्तेमाल होता है।

राजाओं के निजी ‘हेयर थेरेपिस्ट’

दीन मोहम्मद की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि ब्रिटेन के राजा King George IV ने उन्हें अपना आधिकारिक “शैम्पूइंग सर्जन” नियुक्त कर दिया। बाद में William IV ने भी उन्हें यह पद दिया। उस दौर में किसी भारतीय के लिए यह सम्मान बेहद असाधारण था।

रेस्टोरेंट से लेकर किताब तक—हर क्षेत्र में पहचान

1810 में उन्होंने लंदन में ‘Hindoostane Coffee House’ की शुरुआत की, जो इंग्लैंड का पहला भारतीय रेस्टोरेंट माना जाता है। इससे पहले 1794 में उनकी किताब ‘The Travels of Dean Mahomet’ प्रकाशित हो चुकी थी, जो अंग्रेजी में किसी भारतीय द्वारा लिखी गई शुरुआती पुस्तकों में से एक थी।

एक अनसुना ग्लोबल इन्फ्लुएंसर

आज के दौर में जब ‘इन्फ्लुएंसर’ शब्द ट्रेंड में है, तब 200 साल पहले साके दीन मोहम्मद असल मायनों में एक ग्लोबल ट्रेंडसेटर थे। उन्होंने भारतीय परंपराओं मालिश, हर्बल उपचार और खानपान को ब्रिटेन में लोकप्रिय बनाया।

इतिहास में खो गई बड़ी कहानी

इतनी उपलब्धियों के बावजूद उनका नाम इतिहास में उतना प्रसिद्ध नहीं हो पाया, जितना होना चाहिए था। 1851 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी हर शैम्पू की बोतल के साथ जीवित है।

नया नजरिया:
यह कहानी हमें बताती है कि ‘मेड इन इंडिया’ का असर कोई नई बात नहीं है। दो सदियों पहले भी भारतीय ज्ञान और परंपराएं दुनिया की जीवनशैली को आकार दे रही थीं—बस फर्क इतना है कि उस वक्त सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन प्रभाव उतना ही बड़ा था।

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