दहेज प्रथा: विवाह संस्कार या सामाजिक व्यापार ?

दहेज के बोझ से चिंतित बेटी और माता-पिता का भावुक दृश्य दहेज नहीं, समान सम्मान और समझ ही सफल विवाह की सबसे बड़ी नींव

सपना परिहार, नागदा जंक्शन

सोलह संस्कारों में विवाह संस्कार में कन्यादान का बहुत ही पवित्र महत्व बताया गया है। पूर्वकाल से ही विवाह में दिए जाने वाले उपहार को माता-पिता द्वारा अपने प्रेम की अभिव्यक्ति माना गया था। परंतु धीरे-धीरे सभ्यता के विकास के साथ-साथ आधुनिक समय और बदलते परिवेश में हमारे रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताएँ और समाज में बढ़ते आधुनिक प्रचलन के कारण विवाह जैसे पवित्र संस्कार को एक व्यापार की दृष्टि से देखा जाने लगा है।

कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकतर विवाहों में लेन-देन के मामले में कई बार अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं। कई माता-पिता विवाह में अधिक धनराशि न दे पाने के कारण और कुछ वर के पिता दहेज न मिलने के कारण विवाह की बातचीत को बीच में ही रोक देते हैं। इसका सबसे बड़ा परिणाम यह होता है कि आज के समय में लड़के और लड़कियों की विवाह-आयु की समय-सीमा बढ़ती जाती है।

हालाँकि आधुनिक युग में परिवर्तन के साथ आज लड़के और लड़कियाँ समान रूप से कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं और लड़कों की तरह लड़कियाँ भी व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त कर अपने परिवार वालों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने और सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। परंतु आज भी बहुत से लोगों की मानसिकता नहीं बदली है। विवाह को लेकर वर पक्ष हमेशा से अपनी सारी बातें मनवाने में आगे रहता है। उन्हें ऐसा लगता है कि यह उनका अधिकार है।

अगर हम आँकड़ों को देखें तो हमें पता चलता है कि विवाह की आयु निकल जाने, विवाह न करने और अन्य कई कारणों से वंश परंपरा भी काफी कम होती जा रही है। विवाह उपरांत सामंजस्य और सहनशीलता न होने के कारण विवाह-विच्छेद भी हो रहे हैं। कई बार गलत तरीके से लड़के और लड़कियाँ दोनों विवाह-विच्छेद कर लेते हैं, जिसका परिणाम दोनों परिवारों को भी भुगतना पड़ता है।

विवाह में लेन-देन की बात आती है तो सारी बातें लड़की वालों के ऊपर थोप दी जाती हैं। मेरे ये व्यक्तिगत विचार हैं कि विवाह को विवाह ही रहने देना चाहिए। उसे व्यापार की वस्तु न मानकर धार्मिक संस्कार की तरह देखना चाहिए। आपसी सहयोग से दोनों परिवारों को अच्छी तरह सोच-समझकर विवाह को स्वीकृति देनी चाहिए।

रही बात दहेज की, तो कोई भी माता-पिता अपनी बेटी को खाली हाथ नहीं भेजते। वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी बेटी का विवाह बहुत धूमधाम से करते हैं। कई जगह ऐसा भी देखा गया है कि दहेज के रूप में मिलने वाली रकम या वर पक्ष की तरफ से चढ़ाए गए गहने आदि, जिन पर स्त्रीधन के रूप में लड़की का अधिकार होता है, कभी-कभी गलत तरीके से उससे छीन लिए जाते हैं।

इसलिए विवाह से पहले ही सभी बातों पर बैठकर बातचीत कर समाधान कर लेना चाहिए। वर्तमान समय में लड़का और लड़की को समान शिक्षा, समान योग्यता और समान सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं। इसके बाद भी आज कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें कमाऊ लड़की चाहिए, लेकिन वह काम के साथ-साथ घर भी संभाले, परिवार को भी संभाले और साथ में ढेर सारा दहेज भी लेकर आए। लेकिन परिवार वाले उसके काम में सहयोग नहीं करते। आज के आधुनिक समय में भी यह देखने को मिलता है कि खाना आज भी महिलाएँ ही बनाती हैं।

बहुत कुछ बदल गया है, परंतु अगर नहीं बदला है तो वह है दहेज। हाँ, दहेज लेने का स्वरूप थोड़ा बदल गया है। लड़के वालों का कहना होता है कि हमारे मेहमानों का स्वागत अच्छी तरह से होना चाहिए। हमें कुछ नहीं चाहिए, आपको जो भी देना है, आप अपनी बेटी को दें। जो भी सामान रहेगा, वह बेटी का रहेगा। आप हमारे मान-सम्मान का ध्यान रखें। हमारे स्टेटस को देखकर, सक्षम न होते हुए भी, वधू पक्ष को अधिकतर माँगें माननी ही पड़ती हैं।

यहाँ एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि दहेज के इस लेन-देन के चक्कर में केवल लड़कियों की उम्र ही नहीं बढ़ रही है। मैंने ऐसे काफी मामले देखे हैं, जहाँ 40 से 45 वर्ष के युवक आज भी अविवाहित हैं। कारण पूछने पर पता चलता है कि उनका कहना है कि उनके लिए कोई योग्य लड़की मिली ही नहीं। कई जगह लड़कियों की भी बहुत सारी अपेक्षाएँ होती हैं और कई लड़कियाँ भी काफी उम्र की हो चुकी हैं, पर उनका विवाह अभी तक नहीं हो पाया।

पर मेरा यह मानना है, और यह मेरा व्यक्तिगत मत है, कि अधिकतर यदि कोई चीज़ रुकावट बनती है तो वह दहेज के रूप में मिलने वाला या देने वाला पैसा और लग्ज़री सुविधाएँ हैं, जिन्हें लड़के और लड़कियाँ दोनों ही चाहते हैं। क्योंकि लड़की वाला जब पैसा देता है तो वह भी इच्छा करता है कि उसकी लड़की को सारी सुविधाएँ मिलें, और लड़के वाले सोचते हैं कि हमारा लड़का इतना योग्य है, तो उसकी योग्यता के अनुसार उसकी कीमत लगाई जाए। जो जितनी अधिक कीमत लगाएगा, उसी से उनके लड़के का विवाह होगा, चाहे वह लड़की उसके योग्य हो या न हो। पर दहेज मिलना ही चाहिए।

तो अगली बार जब विवाह की बात हो, तो लेन-देन की बात खुलकर करना, विशेषकर लड़की वाले। क्योंकि आप अपनी बेटी के लिए वर खरीद रहे हैं। जब दहेज देना ही है, तो परखना अवश्य कि लड़के वाले इस योग्य हैं या नहीं।

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