
पूनम सिंह “वत्सला”, जमशेदपुर
कुछ यात्राएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे जीवन की ऐसी मधुर स्मृतियाँ बन जाती हैं, जिन्हें याद करते ही चेहरे पर मुस्कान और मन में अपनापन उतर आता है। मेघालय की यह यात्रा भी मेरे जीवन की ऐसी ही अविस्मरणीय स्मृतियों में शामिल हो गई।

उस दिन प्रातःकाल हम सब अपने घर से रिश्तेदार के घर के लिए निकले। वहीं से बस द्वारा कोलकाता जाना था और फिर वहाँ से ट्रेन पकड़कर शादी में शामिल होने के लिए मेघालय पहुँचना था। लगभग पच्चीस लोगों का हमारा पूरा परिवार इस यात्रा का हिस्सा था। हर किसी के चेहरे पर उत्साह था। कोई सामान सँभाल रहा था, कोई बच्चों को संभाल रहा था, तो कोई बार-बार समय देख रहा था।
कोलकाता पहुँचते-पहुँचते शाम के चार बज चुके थे और संयोग ऐसा कि हमारी ट्रेन का समय भी ठीक चार बजे का ही था। ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर लग चुकी थी। फिर तो जैसे पूरा दृश्य किसी फ़िल्म की तेज़ रफ्तार दौड़ जैसा हो गया। सभी लोग जल्दी-जल्दी ट्रेन की ओर भाग रहे थे। उस समय किसी को यह देखने की फुर्सत नहीं थी कि कौन आगे है और कौन पीछे। सबके मन में बस एक ही चिंता थी, कहीं ट्रेन छूट न जाए।

हमारे साथ कुछ बुज़ुर्ग भी थे। किसी के पैरों में दर्द था, लेकिन उस समय ऐसा लगा जैसे दर्द भी कहीं पीछे छूट गया हो। सभी पूरी ताकत से आगे बढ़ रहे थे। वह भागदौड़ आज भी याद आती है तो बरबस हँसी आ जाती है।
इसी अफरा-तफरी के बीच दुल्हन के भाई ने यह सोचकर कि कहीं कोई पीछे न रह जाए, ट्रेन की चेन खींच दी। अगले ही पल रेलवे पुलिस वहाँ पहुँच गई और उसे नीचे उतार लिया। दुल्हन के माता-पिता भी उसके साथ ट्रेन से उतर गए। एक पल के लिए सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा।
कुछ देर बाद फ़ोन की घंटी बजी। उधर से खबर मिली कि वे सभी सुरक्षित हैं। उन्होंने होटल में कमरा ले लिया है और अगली सुबह फ्लाइट से मेघालय पहुँच जाएंगे। यह सुनते ही जैसे सबकी साँसों को राहत मिल गई। तब जाकर मन शांत हुआ।

इधर ट्रेन में बैठने के बाद एक नया अध्याय शुरू हुआ। पहले तो सब अपने-अपने सामान की खोज में लग गए। किसका बैग कहाँ है, किसका सामान किस सीट पर रखा है. इसी में काफी समय निकल गया। लगभग एक घंटे बाद सब व्यवस्थित होकर अपनी सीटों पर बैठ पाए।
दिनभर की यात्रा ने शरीर को थका दिया था। किसी का सिर दर्द कर रहा था, किसी की कमर जवाब दे रही थी, तो कोई आँखें मूँदकर कुछ देर आराम करना चाहता था। तभी डिब्बे में गूँजती आवाज़ आई “चाय… चाय…”। गरमागरम चाय की चुस्कियों ने मानो पूरे शरीर में नई ऊर्जा भर दी।
थकान दूर होते ही फिर वही भागदौड़ चर्चा का विषय बन गई। कौन कैसे भाग रहा था, किसने किसे आवाज़ दी, कौन लगभग गिरते-गिरते बचा. इन बातों को याद करते ही पूरे डिब्बे में ठहाके गूँजने लगे। देखते ही देखते अंताक्षरी शुरू हो गई। गीतों, हँसी और शरारतों के बीच कब रात बीत गई, पता ही नहीं चला। परिवार और रिश्तेदारों के साथ बिताए ऐसे पल जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं।
अगले दिन सुबह लगभग ग्यारह बजे हम गुवाहाटी पहुँचे। वहाँ पहले से बस हमारा इंतज़ार कर रही थी। सभी अपने-अपने स्थान पर बैठ गए और मेघालय की ओर यात्रा प्रारंभ हुई।
जैसे-जैसे बस आगे बढ़ती गई, प्रकृति अपने नए-नए रूप दिखाती चली गई। घुमावदार सड़कें, ऊँचे-ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ और चारों ओर फैली हरियाली मानो प्रकृति का जीवंत चित्र बन गई थीं। खिड़की से बाहर झाँकते हुए ऐसा लगता था जैसे बादल हमारे साथ-साथ चल रहे हों।
रास्ते में एक रिश्तेदार के घर चाय-नाश्ता किया। थोड़ी देर विश्राम के बाद हम फिर आगे बढ़े और अंततः मेघालय के उस सुंदर रिसॉर्ट में पहुँच गए, जहाँ हमारा ठहराव था। अपनी मंज़िल पर पहुँचकर जो राहत मिली, उसे शब्दों में बाँधना आसान नहीं।हमारा कमरा नंबर 202 था। जैसे ही चाबी मिली और हमने कमरे का दरवाज़ा खोला, एक लंबी साँस लेकर भीतर प्रवेश किया। यात्रा की सारी थकान जैसे उसी पल बाहर रह गई। थोड़ी देर में सब तैयार होकर नीचे पहुँचे।

रिसॉर्ट का दृश्य इतना मोहक था कि कुछ क्षणों के लिए भूख भी जैसे कहीं खो गई। चारों ओर फैली हरियाली, पहाड़ों की गोद, स्वच्छ हवा और मन को छू लेने वाला वातावरण देखकर मन बार-बार प्रकृति का धन्यवाद कर रहा था। तभी किसी ने आवाज़ लगाई “आइए, नाश्ता तैयार है।” फिर हम सबने मिलकर नाश्ता किया।उसके बाद तो बस तस्वीरें खिंचवाने का सिलसिला शुरू हो गया। हर कोना इतना सुंदर था कि लगता था हर दृश्य को कैमरे में नहीं, बल्कि दिल में कैद कर लिया जाए। उस यात्रा ने केवल हमें मेघालय नहीं पहुँचाया, बल्कि परिवार के साथ बिताए अनमोल पलों, हँसी, अपनत्व और यादों से हमारी झोली भर दी।
आज भी जब उस यात्रा को याद करती हूँ तो ट्रेन की वह भागदौड़, चेन पुलिंग की घटना, परिवार की चिंता, अंताक्षरी की मधुर धुनें और मेघालय की हरी-भरी वादियाँ एक चलचित्र की तरह आँखों के सामने तैरने लगती हैं। सच ही तो है ..मंज़िलें भले भूल जाएँ, लेकिन सफ़र और उसमें साथ चलने वाले लोग जीवन भर याद रहते हैं।

Bahut acha likha hai dil ko chuh gya