
ममता सिंह देवा
जनाब ! बाहर एक पति-पत्नी अपनी लापता बच्ची की रिपोर्ट लिखाने आए हैं आपसे मिलना चाहते हैं” सिपाही ने सैल्यूट करते हुए कहा।
“अंदर भेज दो।”
सिपाही को देखते हुए माधवी ने कहा।
“जी जनाब।”
कुछ ही पल में एक आदमी-औरत दरवाज़े के अंदर आए। औरत रो रही थी…
“मैडम जी ! मेरी बेटी को ढूंढ दीजिए,वो बोल नहीं सकती है और दिमाग़ से भी मंद है घर का दरवाजा खुला था और वो निकल गई।”
“उम्र क्या है?”
“दस साल की है मैडम जी।”
“राम सिंह इनकी रिपोर्ट लिखवाओ और फोटो लेकर इनके घर के आस-पास आदमी भेजो।”
“जी जनाब।”
बच्ची को ढूंढ निकाला पुलिस ने घर के पास की ही बस्ती में मिल गई थी।
“मैडम जी! हम इसको एक पल के लिए भी नहीं छोड़ते हैं, हमारे बाद इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? यही मनाते हैं कि हमारे साथ हमारी बेटी को भी भगवान ऊपर बुला लें।”
“अरे! हिम्मत नहीं हारते!”
ढांढस बंधाते हुए माधवी ने कहा।
“जनाब बस्ती के बच्चों ने बहुत मारा इसको कि मार खाकर ये कैसे कूदती है, चिल्ला तो ये सकती नहीं।”
“ध्यान रखो अपनी बेटी का…राम सिंह मैं मीटिंग में जा रही हूं घंटे-दो घंटे में आ जाऊंगी ‘एफ आई आर’ की सारी रिपोर्ट मेरे टेबल पर होनी चाहिए।”
“जी जनाब।”
मीटिंग लंबी चली दो की जगह चार घंटे ऑफिस पहुंचते ही देखा राम सिंह ने अपना काम समय से कर दिया था।
“राम सिंह एक कप बढ़िया काॅफी पिलाओ सर दर्द से फट रहा है।”
कह कर माधवी फाइल देखने में लग गई।
फोन की घंटी बजी तो देखा रात के आठ बज रहे हैं फोन पर कात्यायनी थी। एक-एक ‘एफ आई आर’ को पढ़ना उसके विषय में दरोगा से बात करना कि किस केस पर कैसे काम करना है इन सबके बीच समय का पता ही नहीं चला।
“हैलो बच्चा।”
“मम्मा आप घर कब आ रही हो?”
“थोड़ी देर में पहुंच जाऊंगी बच्चा… होमवर्क हो गया?”
“हां मम्मा- पापा ने करवा दिया।”
“वेरी गुड…अभी फोन रखो बच्चा! घर आकर बात करती हूं।”
घर आकर राघवेन्द्र और कात्यायनी के साथ खाना खाया और कात्यायनी को सुलाने के लिए उसको कहानी सुनाने के लिए बिस्तर में घुस गई। कात्यायनी को सुलभा अम्मां, राघवेन्द्र और माधवी मिलकर संभाल लेते थे लेकिन रात को सोते वक़्त कहानी तो माधवी को ही सुनानी पड़ती थी। कभी-कभी एमरजेंसी में रात को घर नहीं आ पाती तो राघवेन्द्र के लिए कात्यायनी को समझाना मुश्किल हो जाता।
कात्यायनी सो गई थी उसको दोहर ओढ़ाकर माधवी किचन में काॅफी बनाने चली गई…दो कप कॉफी लेकर राघवेन्द्र के पास उसकी स्टडी में आ गई।
“थैंक्स राघव।”
“फाॅर वाॅट?” राघव ने काॅफी का कप उठाते हुए पूछा ।
“हर वक़्त मेरा साथ देने के लिए ।”
“तुम भी तो मेरा साथ देती हो तभी तो मैं अपना बिज़नेस देख पाता हूं।”
अचानक से माधवी को लगा जैसे खाना मुंह में आ गया वो वाॅशरुम की तरफ भागी।
“आर यू ओके मधु?”
“लगता है खाना कुछ ज़्यादा खा लिया इसलिए सब निकल गया।”
“तुम काॅफी मत पियो मैं ठंडा दूध देता हूं यू फील बैटर।”
सुबह माधवी जल्दी निकल गई सोचा अपनी गायनेकोलॉजिस्ट से मिलती हुई ऑफिस चली जाएगी।
ऑफिस पहुंचते ही पता चला एक बुजुर्ग दंपति का उनके फ्लैट में मर्डर हो गया है उसका मौका-ए-वारदात पर पहुंचना ज़रूरी था।
गायनेकोलॉजिस्ट ने ब्लड रिपोर्ट फोन पर भेज दी थी जैसा उसने सोचा था वही हुआ रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी । घर लौटते हुए माधवी यादों में खो गई।
नई-नई शादी हुई थी ‘आई पी एस’ माधवी रधुवंशी की, जो अब माधवी सोलंकी हो चुकी थी…लंबा घूंघट, हाथों में भर-भरकर चूड़ियां, मांग में दमकता सिंदूर, रस्मों-रिवाज़ निभाते रात हो गई।
कल मुंह दिखाई की रस्म थी, कपड़े बदलकर माधवी सास के बगल में तुरंत सो गई।
सुबह-सुबह तेज़ शोर से माधवी की नींद खुली कोई तेज़ आवाज़ में चिल्ला रहा था…
दे आर माई एनिमी नाॅट माई फादर!
सीढियां उतरती हुई माधवी आंगन में आ गई वहां देखती है कि एक गोरे-लंबे-तगड़े व्यक्ति जो किसी ग्रीक देवता की तरह लग रहे थे, जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। जेठ-देवर और नौकरों ने पकड़ रखा था लेकिन इतने गठीले बदन के मालिक को संभालना मुश्किल हो रहा था।
“जंजीर ले आओ! पापा बिना उसके काबू में नहीं आयेंगे” राघव की आवाज़ सुनकर माधवी पीछे मुड़ी…तो ये जिनको जंजीर से बांधने की बात कर रहा है वो ससुर जी हैं ? कहा तो गया था कि थोड़ी सी दिमागी प्रॉब्लम है लेकिन यहां तो सीन ही अलग था।
“मधु तुम अंदर जाओ” राघवेन्द्र ने माधवी की तरफ देखते हुए कहा।
थोड़ी देर बाद राघव पसीने से तर-ब-तर कमरे में आया और माधवी का हाल पकड़कर बोला “पापा से डरना नहीं मधु एकदम नार्मल रहते हैं लेकिन दादा जी को देखते ही एग्रेसिव हो जाते हैं।”
“दादा जी को देखते ही… ऐसा क्यों?”
“वो इसलिए कि जब पापा को मेंटल प्रॉब्लम शुरू हुई तो उन्हें आगरा के मेंटल हाॅस्पीटल में दिखाया गया वहां के डाक्टरों ने पापा को इलेक्ट्रिक शॉक दे दिया जिसकी इनको ज़रूरत नहीं थी…वो दिन और आज का दिन दादा जी को देखते ही एग्रेसिव हो जाते हैं और उनको अपना दुश्मन समझते हैं।”
“पापा को इंजेक्शन दे दिया है कल सुबह तक नार्मल हो जायेंगे…तुम तैयार हो जाओ तुम्हारी मुंह दिखाई भी तो है।”
माधवी नहा-धोकर तैयार हो नीचे उतर आई सासू जी ने उसको देखा और आवाज़ लगाई…”बड़ी बहू ज़रा नज़र उतारने का इंतज़ाम करो कहीं मेरी नजर ही ना लग जाए।”
शाम को महिलाओं की अच्छी खासी भीड़ थी सबके मुंह पर एक ही बात “भगवान ने सूरत और सीरत भर-भरकर दिया है राघवेन्द्र की तो किस्मत खुल गई।”
रात में पूरे खानदान का भोज था तभी माधवी ने देखा कि एक कोने में एक लड़का सिकुड़ा सा खड़ा है उसने राघव की तरफ देखकर आंखों से पूछा कि ये कौन है ?
राघव उस लड़के को पकड़कर उसक पास ले आया और बोला “भाभी के पैर छुओ।”
ओह! तो ये है वो देवर जिसके बारे में राघव ने बताया था कि ये भाई थोड़ा मंदबुद्धि है इसलिए चुप-चुप रहता है कोई बात समझाने से समझ जाता है।
माधवी के दिमाग़ में बहुत उथल-पुथल चल रही थी लेकिन शादी का फैसला सब जानते हुए उसने ही लिया था हां ससुर जी का इतना एग्रेशन नहीं पता था।
दूसरे दिन सुबह ससुर जी शांति से चाय पी रहे थे बगल में उनका दुलारा जर्मन शेफर्ड ‘ब्लैंका’ बैठा था। कोई भी देखे तो डर जाए लेकिन यहां तो बिल्ली बना था, पैर छुआ तो ससुर जी ने सर पर हाथ फेर दिया।
आज रसोई छुआई की रस्म थी तो वो रसोई की तरफ चल दी वहां सास जी और जेठानी खाना बनाने वाली मंगली के साथ खाने की तैयारी में लगीं थीं, मुझे देखा तो बोलीं बहू आज तुमको खीर बनाकर शुभ करना है।
“अम्मां जी अभी तक बुढ़निया नहीं आये!”
मंगली ने कहा।
“सब्र कर आ जाएंगे…तेरी पोती कहां हैं?”
“मीरा बाहर खेल रही होगी…बुढ़निया आ जाते तो मीरा का घुटना जो आपस में लड़ जाता है उनकी दवाई से ठीक हो जाए फिर वो बिना गिरे दौड़ती।”
तभी एक चार साल की छोटी बच्ची दौड़ती आई और मंगली का आंचल पकड़कर बोली –
“बूढ़े दादा आ गए!”
अपने आंचल में हाथ पोंछती मीरा का हाथ पकड़कर बाहर आंगन में आ गई…माधवी ने देखा एकदम जर्जर बूढ़ा जिसके चश्मे का ग्लास इतना मोटा था कि उसकी आंख ही नहीं दिखाई दे रही थी और जो मोटे धागे से बंधा कान में लपेटा हुआ था। उसने एक पीतल का लोटा निकाला और मीरा को पकड़कर उसके घुटने के अंदर के भाग को लोटे की पेंदी से रगड़ने लगा। मीरा थोड़ी कसमसाई लेकिन बुढ़निया के एक हाथ में भी गज़ब की ताक़त थी कसकर पकड़ा रहा।
“लेई जा ऐको दुई दिन बाद फेर आई जाब अभई दस-बारह बारी रगड़े के होई फिर एकदम्मे ठीक होई जाई।”
मंगली ने मीरा को कसकर सीने से लगा लिया और बड़बड़ाने लगी “मेरी एक ही पोती रहेगी स्वस्थ रहेगी…पढ़ेगी लिखेगी अफसर बनेगी किसी को इसकी जिम्मेदारी लेने की ज़रूरत नहीं है।”
“घर आ गया जनाब।”
ड्राइवर की आवाज़ से तंद्रा टूटी।
अंदर गई तो देखा राघव ने जंग जीत ली थी, कात्यायनी कहानी सुनकर सो चुकी थी।
“राघव तुमसे ज़रूरी बात करनी है।”
“बोलो।”
“आई एम प्रेगनेंट…मैंने डिसीजन ले लिया है मुझे ये बच्चा नहीं चाहिए मैं ये रिस्क नहीं ले सकती, ज़रूरी तो नहीं कि हमारा दूसरा बच्चा स्वस्थ ही हो और अगर हमारा दूसरा बच्चा तुम्हारे भाई की तरह हो गया तो?”
“समझ सकता हूं मैं लेकिन ऐसा हो ये ज़रूरी नहीं है।”
“मानती हूं तुम्हारी बात अगर ऐसा हो गया तो? हम उसकी देखभाल कर लेंगे लेकिन हमारे बाद क्या होगा? मंगली अपनी एक पोती से खुश थी उस अनपढ़ को भी उसके स्वास्थ की चिंता थी वो अपनी पोती की ज़िम्मेदारी किसी पर भी नहीं छोड़ना चाहती थी।”
“क्या हम इतने पढ़े-लिखे होकर अपने बाद अपनी ज़िम्मेदारी कात्यायनी पर डाल जाएंगे?” माधवी ने सुबकते हुए कहा।
“बहुत बड़ी बात कह दी मधु… हम अपनी ज़िम्मेदारी को कात्यायनी के कंधे पर बोझ के रूप में नहीं डाल सकते।”
मासूम सी कात्यायनी बेफिक्र गहरी नींद में सो रही थी।

धन्यवाद सुरेश परिहार जी 😊