
खुशबू गोयल, सिलीगुड़ी
भूख क्या है, ये उनसे पूछो,
जो एक-एक निवाले को तरसता है।
वो क्या जाने भूख का दर्द,
जो थाल भर खाकर तड़पता है।
भूख क्या है, ये उनसे पूछो,
भूख से जिनकी आँतें सूख गई हैं,
चेहरों पर जिनके आँसुओं की लकीरें जमी हैं।
कहीं बाप लाचारी में
रात-रात भर आँसू बहाता है,
तो कहीं माँ अपने हिस्से की रोटी भी
बच्चों को खिला देती है।
कहीं दावतें सजाई जाती हैं,
तो कहीं हिस्से में सिर्फ़ सूखी हवाएँ आती हैं।
कहीं रोटियाँ यूँ ही फेंक दी जाती हैं,
तो कहीं नज़रें एक टुकड़े के लिए तरस जाती हैं।
काश, ये भूख बिकती बाज़ारों में,
तो लाइनों में यही बेबस खड़े होते।
बेच देते अपनी भूख को,
अरे, बेच देते अपनी तड़प को,
ताकि भूखे रहकर मरना न पड़ता।
मिल जाए बस एक निवाला,
इस आस में दर-दर भटकना न पड़ता।
मगर अफ़सोस…
भूख बिकती नहीं,
बस हर वक़्त ग़रीब ही बिकता है।
