सामाजिक संघर्ष, गरीबी और मानवीय विवशता को दर्शाता एक यथार्थवादी भावनात्मक दृश्य।

मंटो, सच आज भी वही है दोस्त…

“मंटो… सच आज भी वही है दोस्त…” समाज, ज़रूरत, गरीबी और संवेदनहीनता की उन परतों को उजागर करती कविता है, जहाँ हालात इंसान और व्यवस्था दोनों को बेनकाब कर देते हैं।

Read More
कड़ी धूप में काम करती एक भारतीय मजदूर महिला, चेहरे पर थकान और उम्मीद, पीछे पढ़ते बच्चे, दो वक्त की रोटी के संघर्ष का भावुक दृश्य।

रोटी दो जून की

अर्पणा सिंह “अर्पी” , रांची बड़ी मुश्किलों से मिल पाती है निजात,मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात। बैशाख की दोपहरी की धूप या बहती लू,पसीने से लथपथ हो या हो तपती भू।तन ढकने को वसन और मिटाने को भूख,इसी की आपूर्ति में रहते हैं हर पल मशगूल। बड़ी मुश्किलों से मिल पाती…

Read More
जब पेट की आग के आगे लोरी भी बेबस हो जाती है।

जहाँ रातें सिसकती हैं

यह कविता झोपड़ी में पलती गरीबी, भूख से बिलखते बच्चे और परिवार के लिए संघर्ष करती एक माँ की दर्दभरी कहानी कहती है। सिसकती रातों और टूटी उम्मीदों के बीच यह कविता समाज की कठोर सच्चाई को संवेदनशील शब्दों में सामने लाती है।

Read More