
रुपाली तोमर
मन हरकारा लाया पाती,
दूर कहीं फिर नौबत बाजी।
तन हुलसा, आँचल ठिठका, अखियाँ चंचल,
पग पायल बाँधे घूम-घूम,
देती मधुमय रस-आमंत्रण।
वो लहर उठी, वो छहर उठी,
छम-छम गोरी फिर छहर उठी।
मेघों ने भी फिर होड़ बाँधी,
गरजे, बरसे हर ओर, सखी।
चातक-सी एक टेर जगी,
हर रात जगी, हर भोर जगी।
स्वाति-सा मेरा मधुसूदन है,
छुपा कहाँ चित्तचोर, सखी?
पाती भी स्वाति न ला पाई,
एक हूक हृदय में उठ आई।
आँसू फिर छलके नयनों से,
ना भई बिरहा की भोर, सखी।

बहुत सुंदर कविता
बहुत बहुत धन्यवाद आपका
मेरी रचना को पसंद करने के लिए
अच्छी कविता
धन्यवाद आपका