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बिरहा की भोर 

विरह में प्रियतम की प्रतीक्षा करती नायिका का भावपूर्ण चित्र स्वाति की प्रतीक्षा में भीगा मन और मधुसूदन के मिलन की आस।

रुपाली तोमर

मन हरकारा लाया पाती,
दूर कहीं फिर नौबत बाजी।
तन हुलसा, आँचल ठिठका, अखियाँ चंचल,
पग पायल बाँधे घूम-घूम,
देती मधुमय रस-आमंत्रण।

वो लहर उठी, वो छहर उठी,
छम-छम गोरी फिर छहर उठी।
मेघों ने भी फिर होड़ बाँधी,
गरजे, बरसे हर ओर, सखी।

चातक-सी एक टेर जगी,
हर रात जगी, हर भोर जगी।
स्वाति-सा मेरा मधुसूदन है,
छुपा कहाँ चित्तचोर, सखी?

पाती भी स्वाति न ला पाई,
एक हूक हृदय में उठ आई।
आँसू फिर छलके नयनों से,
ना भई बिरहा की भोर, सखी।

4 thoughts on “बिरहा की भोर 

    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका
      मेरी रचना को पसंद करने के लिए

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