विशालता की छाया में दम तोड़ता विकास
यह लेख हमारे समय के उस भ्रम को उजागर करता है जिसमें “बड़े होने” को ही “बेहतर होने” का पर्याय मान लिया गया है, और बताता है कि कैसे यही सोच नई प्रतिभाओं और अवसरों को दबा देती है।

यह लेख हमारे समय के उस भ्रम को उजागर करता है जिसमें “बड़े होने” को ही “बेहतर होने” का पर्याय मान लिया गया है, और बताता है कि कैसे यही सोच नई प्रतिभाओं और अवसरों को दबा देती है।
रीमा धुएँ और धूल से भरे आसमान को निहारते हुए सोचती है—क्या स्वच्छ हवा केवल ऊँची इमारतों में रहने वालों का अधिकार है? झोपड़ियों में रहने वाले लोग भी तो उसी धरती और हवा का हिस्सा हैं। एक नन्हा पौधा उसे उम्मीद देता है कि अगर हम चाहें, तो ज़हरीली हवाओं के बीच भी जीवन को बचाया जा सकता है।