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एक भूखा बच्चा रोटी की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखता हुआ

भूख

यह मार्मिक कविता भूख, ग़रीबी और सामाजिक विषमता की उस कठोर सच्चाई को सामने लाती है, जहाँ एक ओर भोजन की बर्बादी है और दूसरी ओर एक निवाले के लिए तड़पते लाखों चेहरे। कविता मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का गहरा संदेश देती है।

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होटल के बाहर भूखी वृद्धा को रोटी देता हुआ एक बच्चा – इंसानियत पर आधारित भावुक हिंदी लघुकथा

सुकून

होटल में बैठा एक परिवार तरह-तरह की रोटियों का ऑर्डर दे रहा था। तभी पिता बाहर मिली एक भूखी वृद्धा का ज़िक्र करते हैं, जो केवल एक सूखी रोटी की आस लगाए बैठी थी। यह सुनकर बेटा चुपचाप अपनी प्लेट से रोटियाँ लेकर बाहर चला जाता है। लौटते समय उसके शब्द सभी के दिल को छू लेते हैं रोटी का असली स्वाद उसकी किस्म में नहीं, बल्कि किसी भूखे का पेट भरने के बाद मिलने वाले सुकून में होता है।

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चोर को पकड़ने के बाद भी भूख के डर से जूझता एक गरीब मजदूर शंभू

डर

चोर को पकड़ने वाला साहसी शंभू किसी इंसान से नहीं डरता, लेकिन जब पत्नी उससे उसके सबसे बड़े डर के बारे में पूछती है, तो उसका उत्तर समाज की सबसे कड़वी सच्चाई उजागर कर देता है—भूख।

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डिब्बे वाले

“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।

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