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सुकून

होटल के बाहर भूखी वृद्धा को रोटी देता हुआ एक बच्चा – इंसानियत पर आधारित भावुक हिंदी लघुकथा

मधु मिश्रा

“हर्ष, ऋचा… ऑर्डर करो न बेटा, क्या-क्या खाना है? मैं पापा को बुलाती हूँ। पता नहीं, वो कहाँ रह गए!” कहते हुए नंदिता अपने पति कबीर को फ़ोन करने लगी।

“मेरे लिए तो मिस्सी रोटी, हर्ष तेरे लिए नान… और मम्मा को कुलचा, पापा के लिए प्लेन रोटी… ठीक है न, मम्मा?” कहते हुए ऋचा ने होटल के वेटर को अपनी टेबल के क़रीब बुलाकर ऑर्डर दे दिया।

“हम लोग यहाँ यह रोटी, वह रोटी ऑर्डर करते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सादी रोटी के लिए भी तरसते हैं।” कहते हुए कबीर टेबल के पास पहुँचे।

“कौन, पापा?” हर्ष ने विस्मित होकर पूछा।

“होटल के बाहर पार्किंग के पास एक वृद्धा लाचारी से कह रही थी. ‘मेरे लिए बस एक सूखी रोटी ही ला देना, बेटा। कल से भूखी हूँ। कितने लोगों से कहा, पर कोई नहीं देता।'”

यह सुनकर बच्चे और नंदिता का मन विचलित हो गया।

थोड़ी ही देर बाद जैसे ही टेबल पर खाना लगा, हर्ष प्लेटों से रोटियाँ उठाने लगा। उसे ऐसा करते देख सभी एक साथ बोले, “क्या कर रहे हो?”

“कुछ नहीं, पापा… मैं अभी बाहर से आता हूँ। तब तक आप और रोटियाँ ऑर्डर कर दीजिए।”

“ठीक किया, बेटा। तुम बाहर रोटी देकर आओ, हम यहाँ और ऑर्डर दे देते हैं।” कबीर उल्लासित होकर बोले।

बाहर जाने के बाद जब काफ़ी देर तक हर्ष वापस नहीं लौटा, तो कबीर ने उसे फ़ोन लगाया।

“क्या हुआ बेटा? कहाँ रह गए? क्या कर रहे हो? आ जाओ, खाना ठंडा हो रहा है।”

“बस, अभी आया पापा! मैं तो यहाँ रोटी के अलग-अलग स्वाद से ज़्यादा, रोटी खाने के बाद का सुकून देख रहा था।”

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