
मनमीत सोनी
किशनगढ़ – अजमेर – जयपुर डिपो की
राजस्थान रोडवेज की बस से उतरी है वह स्त्री
गोदी में चार-पाँच बरस का बच्चा
कंधे पर विष्णु साड़ी भंडार का झोला
नाक में नथनी
हाथों में लाख की चूड़ियाँ
गले में काला धागा
पाँव में रेगज़ीन की चप्पल
लाल साड़ी फूलों वाली
काला ब्लाउज पसीने से भरा
देखकर उसे लगता था
कि बस में जी घबराता रहा उसका
इसीलिए तो वह गई “डोली पुचका सेंटर” के ठेले पर
और उसने पूछा :
“दस के कितने पुचके?”
“तीन पुचके, एक पापड़ी” सुनकर उदास हुई वह
लेकिन उसने माँगी एक प्लेट
और पहले पुचके के साथ जब खोला अपना मुँह
तो बच्चे ने पकड़ लिया पल्लू
पुचके का पानी पिया स्त्री ने
पुचका खिलाया बच्चे को
आलू में से प्याज़ खाया ख़ुद
आलू खिलाया बच्चे को
सड़क के किनारे खड़ा मैं
देखता रहा इस महा-भोग को
फिर वही पुचका
पानी पिया स्त्री ने
पुचका खिलाया बच्चे को
आलू में से प्याज़ खाया ख़ुद
आलू खिलाया बच्चे को
फिर वही पुचका
लेकिन आख़िरी पुचका
कैसे रोकती वह बाईस-तेईस बरस की स्त्री ख़ुद को
सो, इस बार पूरा पुचका नहीं खिलाया बच्चे को
आधा खिलाया बच्चे को
आधा खाया ख़ुद
और इस जुर्म की सज़ा उसने ख़ुद को यूँ दी
कि पुचके का पानी नहीं पिया उसने
बिखेर दिया सड़क पर
अहा!
हे ईश्वर!
तूने माँ को कैसा अजीब और कितना बड़ा दिल दिया है!
एक मुड़ा हुआ
पसीने से भीगा बीस का नोट निकाला उसने ब्लाउज से
पकड़ाया पुचके वाले को
पुचके वाले ने दस वापस दिए
और एक पापड़ी में लगाकर हल्की-सी मिर्च और नमक
बच्चे को बोला : “आ कर”
बच्चे के मुँह में डाल दिया!
हे ईश्वर!
मर्द भी इतना बुरा नहीं होता जितना सोचा जाता है!
चली गई वह स्त्री
कंधे पर लादा उसने विष्णु साड़ी भंडार का थैला
बच्चे को उठाया गोद में
तबेले मार्केट की टैक्सी की
बीस के बदले पंद्रह का सौदा पटाया
कितना स्वार्थी हो गया हूँ इन दिनों
कि सोचता हूँ
काश वह स्त्री कुछ और देर रुकती
तो कविता की दस-पंद्रह पंक्तियाँ और मिल जातीं
आँखों के आगे से
हट नहीं रही है वह स्त्री
मेरा दिल एक बड़े पुचके में बदल गया है
मेरा जी करता है
मेरा लहू
पुदीने का नमकीन खट्टा पानी बन जाए
मुझ पर
कोई पुचके वाला नमक-मिर्च लगाए
मुझे आधा कोई बच्चा खाए
मुझे आधा कोई स्त्री खाए
और बाक़ी का मैं सड़क पर बिखर जाऊँ
घर जाना था मुझे
वरना मैं कुछ और देर रुकता डिपो पर
किसी और स्त्री को देखता
रींगस – पलसाना – सीकर की बस से उतरते
देखता उसे “छोटू चुस्की वाला” पर चुस्की चूसते
उसका भी शायद जी घबराया हो बस में
वह भी उल्टी करती आई हो खिड़की से
उसका भी कोई बच्चा हो जो मचलता हो पल्लू पकड़कर
ऐसे ही महान दृश्यों!
तुम मंदिरों की भीड़
तुम क्रांतियों की भीड़
तुम राशन की भीड़
तुम थिएटर की भीड़ से बहुत अलग हो
बहुत बड़े हो
बहुत रंगीन हो
बहुत ज़रूरी हो
मुझ सादा-दिल के जीवन में
तुम आते रहना
तुम आते ही रहना!
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