
विजया डालमिया, हैदराबाद
रजनीगंधा की खुशबू और गुलमोहर की ऊर्जा—एक प्रेमी और प्रेमिका की कहानी की तरह हैं, जिसमें जुनून है… प्रतीक्षा है… इंतज़ार है… आँसू हैं और हर पल को मदहोश कर देने वाली महक है।
नारंगी फूल गहरे एहसासों की तरह तपती दोपहर में भी प्रतीक्षा करते हुए किसी तन्हा आशिक की तरह नज़र आते हैं और जब बिखरते हैं तो लाल सिंदूर की तरह सज जाते हैं।
वहीं रजनीगंधा के फूल रात के एकांत में पवित्रता की खुशबू लिए यूँ महकते हैं, जैसे कोई प्रेमी रात भर यादों की खुशबू में भीग रहा हो।
गहराती हुई रात के साथ जब किसी की यादें रजनीगंधा में समा जाती हैं, तब प्रेम धीरे से कह उठता है—
“मैं शोर नहीं करता…
खुशबू की तरह चुपचाप तुममें समा जाता हूँ।”
गुलमोहर और रजनीगंधा दोनों कितने अलग हैं… किंतु हवा हो या बारिश, उन्हें अपने साथ बहाकर कहीं भी ले जाए—दोनों ही खिले-खिले रहते हैं।
रजनीगंधा अपनी महक नहीं छोड़ती,
गुलमोहर अपना रंग और अपनी ताज़गी नहीं खोता।
और जब दोनों साथ-साथ बिखरे होते हैं, तो वे बिखरे हुए नहीं लगते…
मिले हुए लगते हैं।
जैसे प्रेम में दो लोग अलग होकर भी एक-दूसरे में बने रहते हैं।
तब गुलमोहर और रजनीगंधा शायद यही कहते हैं—
“हम साथ-साथ हैं…”
क्योंकि सच्चा प्रेम साथ रहने का नाम नहीं,
एक-दूसरे में बने रहने का नाम है।
