
सपना शाह, सूरत
क्या जीना-मरना ऐसे इंसानों का
ना रखवाला हो जो सब किसानों का
भूला वो साथी, वादे करके सारे
थोड़ा तो झूठा है वो उसूलों का
ऐसा देखा ना कोई दूजा बैरी
जो न प्रेमी होगा रहनुमाओं का
थोड़ी बाकी हैं जो भी लौ शोलों में
फूँकेगा वो ही पानी इरादों का
मंज़िल पाई है अंगारों पर चल के
‘सपना’ वो भी क़ायल था किताबों का
