डर

चोर को पकड़ने के बाद भी भूख के डर से जूझता एक गरीब मजदूर शंभू

नीलम राकेश

जिस मालकिन के गैराज में शंभू अपने परिवार के साथ रहता था, उनके घर एक रात चोर घुस आया। जान की परवाह किए बिना दुबले-पतले शंभू ने पीछे से जाकर चोर के तेल लगे शरीर को इतनी मजबूती से जकड़ लिया कि वह छूट नहीं पाया। मोहल्ले वालों की मदद से चोर को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया।

सब लोग शंभू की बहादुरी की प्रशंसा कर रहे थे।

गैराज में लौटने पर उसकी पत्नी ने प्यार से पूछा,

“तोके केहू से डर नाहीं लागत ना?”

“काहे नाहीं लागत?”

“अरे… काहे से डर लागत है तोहके?” पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।

शंभू ने पत्नी से नज़रें चुराते हुए धीमे स्वर में कहा,

“भूख से।”

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