गरीबी
बंद दरवाज़ा
“बंद दरवाज़ा” एक मेहनतकश इंसान की कहानी है, जो रोज़ी-रोटी के संघर्ष में अपने सपनों को दबा देता है, लेकिन फिर भी उम्मीद के जुगनू उसकी आँखों में टिमटिमाते रहते हैं।
महंगाई
आज की महंगाई ने जीवन को बहुत मुश्किल बना दिया है। हर चीज़ की कीमत बढ़ गई है और आम आदमी का घर चलाना कठिन हो गया है। पहले जो छोटी-सी चीज़ें आसानी से मिल जाती थीं जैसे मोटर या भिंडी . अब उन्हें खरीदना भी मुश्किल हो गया है। तेल न होने पर खाना बनाना भी मुश्किल हो जाता है और परेशानियाँ बढ़ जाती हैं। लोग पूछते हैं तो कुछ कह नहीं पाते, और ना पूछें तो मन में ही दुःख बढ़ता रहता है। महंगाई की मार से जीवन इतना जटिल हो गया है कि इसे अनदेखा करना भी मुश्किल है।
कौन हैं वो..?
बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी, अपनेपन की एक बूंद के लिए तरसती वह महिला… थकी हुई आंखों से अपने अस्तित्व को खोजती, सड़क के किनारे किसी निर्जीव वस्तु की तरह पड़ी। कभी अपने अपनों को ममता की छांव देने वाली, आज गैरों से दया की उम्मीद लगाए बैठी है। उसने अपनी पूरी जिंदगी अपनों की फिक्र में, उनके भविष्य को सँवारने में गुज़ार दी, खुद को भुलाकर हर सुख-दुख में उनकी परवाह की। अपनी इच्छाओं को अनदेखा कर, मुस्कुराते हुए हर दर्द सहा। और आज वही अपने, उससे रू-ब-रू होना नहीं चाहते, उसके साए से भी दूर भागते हैं। जिनके लिए उसने सब कुछ त्यागा, उनके पास अब इतना भी वक्त नहीं कि वे उसकी ओर देख लें। उजाले के बीच भी, जिसे कोई पहचानना नहीं चाहता—वह लाचार, उपेक्षित माँ।
लिहाफ़ : कहानी जो सुनी थी…
पूस की रात, पतले लिहाफ़ और भूख से जूझते एक परिवार की कहानी में ठंड, गरीबी और संघर्ष के बीच भी उम्मीद की रोशनी झलकती है। जब रिक्शा चला कर लाया गया आटा-दाल और मुनिया की मुस्कान से ढेबरी से ज़्यादा रौशनी उनकी झोपड़ी में फैलती है, तो यह कहानी केवल ठंड की नहीं, जुगत और जज़्बे की भी बन जाती है।
