वो लड़की

कनॉट प्लेस में रंग-बिरंगे पंखे बेचती एक छोटी लड़की, मासूम आंखों और श्रम से भरी हथेलियों के साथ मेहनतकश बच्ची

अपूर्वा, बिजनौर (उत्तर प्रदेश)

बहुत कुछ कह गई
पंखा बेचती
अखरोट के रंग की
आँखों वाली वो लड़की
अपनी आलता लगी हथेलियों से
मेरे दुपट्टे का कोना पकड़े
”दीदी ले ल्यो ना” का
गीत गाती रही
लापरवाही से
बाँधे हुए बालों में
रंग-बिरंगी कतरनों से बने
क़ो के पंखों को
एक टोकरी में लटकाये
डोलती रही वो कनट प्लेस में
मैं देखती रही
उसकी आलता लगी हथेलियाँ
जिनकी रेखाओं में
श्रम का झरना झर रहा था
जामनी शर्ट
और हरी बांधनी लांग स्कर्ट में
इतराती, शरमाती
छिपती, मिलती
तितली-सी
घूमती रही वो
बड़ी-बड़ी
बोलती हुई आँखें में
कजरारे सपने सजाये
नाक में
चाँदनी में रंगी
छोटी-सी लौंग पहने
दिन भर
पंखे बेचती रही
उसके मीठे अनुरोध पर
एक पंखा खरीद लिया था
पर
अगर बस में होता तो
उन्ही पंखों से
बुन देती उसके लिए पंख
जिनसे उड़ान भर
वो करती नई यात्राएँ
साथ लिए अनगिनत संभावनाएं


लेखिका के बारे में-
अपूर्वा
समकालीन हिंदी साहित्य की एक संवेदनशील और सशक्त आवाज़ हैं, जिनकी लेखनी में भावनाओं की गहराई और विचारों की परिपक्वता सहज रूप से दिखाई देती है। 16 दिसंबर 1994 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर में जन्मी अपूर्वा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें विविध विधाओं कविता, डायरी अंश, संस्मरण और समीक्षा में सृजन करने के लिए प्रेरित किया। उनकी रचनाएँ नया ज्ञानोदय, मुक्तांचल, गगनांचल, सृजनलोक, समकालीन अभिव्यक्ति, बाल भारती, कवितांजलि, सृजन कुंज, पब्लिक इमोशन तथा अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके साथ ही, उनके शोध पत्र भी विभिन्न अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर उनके बौद्धिक पक्ष को सुदृढ़ करते हैं। उनका प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘स्मृति नाद’ उनकी रचनात्मकता का जीवंत प्रमाण है, जिसमें स्मृतियों और संवेदनाओं का सुंदर ताना-बाना बुना गया है। वर्तमान में अपूर्वा शोध कार्य में संलग्न हैं और निरंतर साहित्य साधना के माध्यम से अपने सृजन को नई ऊँचाइयों तक ले जा रही हैं।

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