उनकी झोपड़ी में ढेबरी हलकी रौशनी दे रही थी. पूस के महीने की ठंड को रोक पाने के लिए लिहाफ़ की तह बहुत पतली थी. लिहाफ़ भी इतना छोटा था कि एक कोना ऊपर करो तो दूसरा कोना खिसक जाता. उसने बहुत कोशिश की लेकिन आधी रात तक वह सो नहीं पाया. उसके और माया के बीच सो रही डेढ़ साल की मुनिया भी बार बार कुनमुनाती शायद भूख से…. या शायद ठण्ड से. बीच बीच में माया उसे अपनी छातियों से लगा कर गर्माहट देने की कोशिश करती. लेकिन अन्न के टुकड़े भी माया के शरीर में गए होते तो कुछ गर्माहट वह बिटिया को दे पाती.
कोहरा ज्यादा पड़ने से ईंट पथाई सुस्त हो गयी थी. जिसके चलते भठ्ठे की चिमनी से कुछ दिनों से धुआँ भी नहीं निकला था. अगर भठ्ठा लगा होता तो कुछ गर्माहट तो वहाँ जाकर ली जा सकती थी. मगर एक तो पूस का महीना उस पर किसी दिन बारिश और किसी दिन धुँध ! कुल मिला कर सब कुछ किस्मत के खेल में खराबी करने के लिए काफी था.
“सोचू हूँ दिन में काम न मिले तो रिक्शा चला लूँ. दिन में भठ्ठे पे काम मिले तो रात में टीशन से कुछ सवारी तो मिल जावेगी. खाने पीने का जुगाड़ तो हो जाए.”
उसकी झोपड़ी में ढेबरी अब भी कुछ रौशनी दे रही थी. नींद ने जोर मारा तो तीनों सुबह होने तक सोते रह गए. नींद खुली वो भी बारिश के पानी के लिहाफ़ पर गिरने से.
बाहर हलकी रौशनी हुई तो उसने ढेबरी की लौ को दबा दिया. “कुछ देर इंतज़ार कर माया. दोपहर तक ले इंतजार कर. तब तक चावल के मांड से मुनिया की भूख शान्त कर.” कहते हुए वह रिक्शा वाले ठेकेदार हरनाम सिंह के घर की तरफ बढ़ लिया.
जुगत करने से ही कुछ होता है ! वह जब शाम को वापस आया तो बहुत खुश था. माया उसके हाथ में आटा दाल देख कर बहुत खुश थी.
“रिक्शा भी सरदार जी से मांग के ले आया हूँ. माया ले पकड़ दुई सौ की रेजगारी. मुनिया का ध्यान रख.” उसने कुछ छोटे छोटे मुड़े तुड़े नोट और सिक्के माया की झोली में पलट दिये।दोनों मुनिया को हँसाने की कोशिश में उसे गुदगुदा रहे थे.
उनकी झोपड़ी में ढेबरी से ज्यादा रौशनी थी.लिहाफ़ चूल्हे की गर्मी में सूख रहा था।

तेजबीर सिंह सधर, प्रसिद्ध कहानीकार, दसुआ
