रिश्ते

अलमारी में टंगे रंग-बिरंगे लेहंगे को देखती एक भारतीय महिला, शादी और पारिवारिक यादों में खोई हुई, भावनात्मक और यथार्थवादी दृश्य।

खुश्बू गोयल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

वो लेहंगा, जो भैया की शादी में लिया था,
उसकी भी बड़ी अजीब कहानी है।

जब भी अलमारी खोलूँ,
माँ को बस वही नज़र आता है,
और हर बार की तरह
उनका कहना शुरू हो जाता है

“इतना भारी लेहंगा क्यों लिया था,
जब तुझे पहनना ही नहीं था?”

बस एक बार भैया की शादी में पहना,
फिर कभी हाथ भी नहीं लगाया।
पर उनको कैसे समझाऊँ,
अब क्या घर पर पहनकर बैठ जाऊँ,
या ऑफिस में पहनकर जाऊँ उसे?

फिर कुछ साल बाद
एक और लेहंगा आया,
बहुत ही खूबसूरत,
यादों से भरा,
बड़ी बारीकी से सजा हुआ,
सुर्ख लाल रंग का लेहंगा-

हाँ जी, मेरी शादी का लेहंगा।

उसकी भी बारी थी
अलमारी में सजने की।

और फिर आई बारी
एक और लेहंगा लेने की।
इस बार देवर की शादी थी,
और फिर वही सिलसिला शुरू हुआ।

इस बार माँ ने नहीं,
सासू माँ ने कहा-

“क्या ज़रूरत है नए लेहंगे की?
पहन लेना अपनी शादी वाला ही।”

फिर वही दुविधा छाई,
कैसे समझाऊँ अब इस माँ को?

शादी मेरी नहीं, देवर की है,
दुल्हन देवरानी को बनना है, मुझे नहीं।
नहीं पहन सकती वह लेहंगा फिर से,
हर मौके की अपनी एक कहानी है।

सच में,
लेहंगे की भी बड़ी अजीब कहानी है।

कभी माँ को खटकता है,
कभी सासू माँ को समझाना पड़ता है,
पर हर औरत जानती है

लेहंगा सिर्फ कपड़ा नहीं होता,
उसमें यादें, मौके और जज़्बात सजे होते हैं।

इसलिए अलमारी में टंगे हर लेहंगे की
अपनी-अपनी एक कहानी होती है।

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