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एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।

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उस शाम…

उस शाम का मौन बहुत कुछ कह गया। आपके कहने का इंतज़ार नहीं था मुझे, क्योंकि आपकी नज़रें और आपकी ख़ामोशी ही मेरे दिल तक उतर आई थीं। वह अहसास किसी अनदेखी धारा की तरह मेरे हृदय को छूता चला गया। आसमान पर टिमटिमाते तारे हमारे साक्षी बने और हरसिंगार की महक ने आपके मन की अनकही बात मुझ तक पहुँचा दी। हम आमने-सामने थे, और ऐसा लगा जैसे हमारे दिलों के द्वार सदियों से एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर रहे हों। दूर तक फैली चाँदनी ने हमें घेर लिया और हरसिंगार की माला ने हमारी आत्माओं को एक सूत्र में बाँध दिया। उस पल न समय का कोई बंधन था, न दूरी की कोई दीवार—बस आप थे, मैं थी और हमारा गहरा, मौन प्रेम।

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