
डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई
नहीं चाहिए संवेदना,
इस दिल में दबी है वेदना।
वक्त ने हर पल चाहा मुझे धकेलना,
हालातों ने मजबूर करके
आँसुओं की गलियों में चाहा बिखेरना।
न जाने किन-किन पीड़ाओं को पड़ा झेलना,
अभिलाषा के बिना भी घावों को पड़ा कुरेदना।
अब जगी है दिल में चेतना,
सारे ग़मों को अब बस समेटना।
बहुत हुआ खुद को समझना,
अब बदलती हवाओं में उड़ना।
सकारात्मकता के साथ सबको पहचाना,
हिंसा की दीवार तोड़ नई दुनिया को देखना।
संघर्षशीलता का संकल्प लेकर तोड़नी है विडंबना,
प्रगतिशील रहूँ हर पल यही है मनोकामना।
लेखिका के बारे में-
डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है। उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।
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