
ममता मंजुला, टोंक (राजस्थान)
मुझे याद आया फ़साना किसी का,
दबे पाँव आना वो जाना किसी का।
वो मिलने न आना ज़माने के डर से,
बहाने बनाकर वो जाना किसी का।
वो पलकें झुकाना मुझे देखते ही,
भला कैसे भूलें लजाना किसी का।
वो इज़हार करना लरज़ते लबों से,
मुहब्बत छुपाकर सताना किसी का।
ग़ज़ल-गीत की मैंने महफ़िल सजाई,
दीवाना है कह के न आना किसी का।
मेरे होश छीने अदाओं ने उसकी,
मुझे लोग कहते दीवाना किसी का।
वफ़ा का सिला मुझको ऐसा दिया है,
ये दिल जैसे दुश्मन पुराना किसी का।
मेरी जान निकली, हुआ जब ये मंजर,
शब-ए-ग़म में मिलने न आना किसी का।
भुलाएँ, बता कैसे यादों को ‘ममता’,
बहुत याद आए मनाना किसी का।
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लेखिका के बारे में-
ममता जाट ‘मंजुला’
समकालीन हिंदी साहित्य की एक सशक्त और बहुआयामी रचनाकार हैं। राजस्थान के टोंक से संबंध रखने वाली ममता जी गद्य और पद्य दोनों विधाओं में समान अधिकार रखती हैं। उनकी लेखनी में संवेदना, समाज और संस्कृति का सुंदर संगम देखने को मिलता है। ‘अंतर्मन के मोती’, ‘अतरंगी’ और ‘आपकी इनायतें’ जैसे काव्य संग्रह उनकी साहित्यिक प्रतिभा के प्रमाण हैं। एक समर्पित शिक्षिका के रूप में वे शिक्षा और सृजन, दोनों क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित होकर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और अखिल भारतीय मंचों पर उनकी प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ सराही गई हैं। साहित्य सारथी मंच के माध्यम से वे नवोदित रचनाकारों को निरंतर प्रोत्साहित कर रही हैं। गीत, भजन और ग़ज़लों के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है, जिन्हें प्रसिद्ध कलाकारों ने स्वर दिया है।
ममता ‘मंजुला’ की लेखनी आज के साहित्य जगत में संवेदना, सृजन और प्रेरणा का सशक्त प्रतीक है।

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