
रुपाली पुरे, खंडवा (मध्यप्रदेश)
घर की देहरी पर बैठा वह बुज़ुर्ग,
जो कभी हमारी हर ठोकर से पहले ढाल बन जाता था,
आज अपने ही घर में
चुपचाप सहारे की तलाश करता दिखाई देता है।
यह किसी एक घर की कहानी नहीं,
आज के समाज की ज्वलंत सच्चाई है।
तेज़ होती ज़िंदगी,
मोबाइल और व्यस्तताओं के बीच
बुज़ुर्गों के अनुभव पुराने लगने लगे हैं,
उनकी बातें अनावश्यक
और उनकी मौजूदगी बोझ समझी जाने लगी है।
वृद्धावस्था कोई बीमारी नहीं,
लेकिन उपेक्षा उसे पीड़ा में बदल देती है।
आर्थिक असुरक्षा,
स्वास्थ्य समस्याएँ
और भावनात्मक अकेलापन
तीनों मिलकर
वृद्ध जीवन को और कठिन बना देते हैं।
आज वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं,
पर घरों में बुज़ुर्गों के लिए
स्थान सिमटता जा रहा है।
जो माता-पिता कभी
अपनी हर इच्छा बच्चों पर न्योछावर कर देते थे,
आज वही
“हमसे कोई गलती हो गई क्या?”
जैसे सवाल पूछने को विवश हैं।
असल समस्या यह नहीं कि
बुज़ुर्ग बदल गए हैं,
समस्या यह है कि
हमारी संवेदनाएँ बदल गई हैं।
जिस समाज ने
बुज़ुर्गों को ज्ञान और अनुभव का स्रोत माना था,
आज वही समाज
उन्हें असुविधा समझने लगा है।
हमें यह समझना होगा कि
सम्मान उम्र से नहीं,
संबंधों से जुड़ा होता है।
वृद्धों को दया नहीं,
साथ चाहिए;
उपदेश नहीं,
संवाद चाहिए।
क्योंकि आज जो
घर की कुर्सी पर बैठे हैं,
कल वही
हमारी जगह होंगे।
यदि आज हमने उन्हें
सम्मान और अपनापन नहीं दिया,
तो कल
हम भी उसी उपेक्षा का हिस्सा बनेंगे।
समाज की सभ्यता का पैमाना यही है कि
वह अपने बच्चों के साथ-साथ
अपने बुज़ुर्गों को
कितना सुरक्षित और सम्मानित रख पाता है।
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