मुस्कुराती बुज़ुर्ग माँ अपने बेटे-बहू के साथ घर के आँगन में खड़ी, परिवार के अपनापन और सुरक्षा का भावनात्मक दृश्य।

“छटती धुंध”

समाचारों में बुज़ुर्गों के साथ बढ़ते अत्याचार की खबरें मन में भय और भविष्य की चिंता भर देती हैं। लेकिन एक दिन बेटे-बहू का लिया गया छोटा-सा निर्णय एक माँ के जीवन की सारी धुंध छाँट देता है। पढ़िए “छटती धुंध”, परिवार, अपनत्व और बुज़ुर्गों के सम्मान का मार्मिक संदेश देती एक भावनात्मक लघुकथा।

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घर की देहरी पर अकेले बैठे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति, जो भावनात्मक अकेलेपन और सहारे की तलाश को दर्शाता है

बुज़ुर्गों की चुप्पी

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में, जहाँ हर कोई अपनी व्यस्तताओं में उलझा है, वहीं घर के बुज़ुर्ग धीरे-धीरे अकेले होते जा रहे हैं। जिन लोगों ने कभी हमें संभाला, वही आज अपने ही घर में सहारे और संवाद की तलाश करते दिखाई देते हैं। समस्या बुज़ुर्गों में नहीं, बल्कि बदलती हमारी संवेदनाओं में है। हमें यह समझना होगा कि उन्हें दया नहीं, बल्कि अपनापन, सम्मान और साथ चाहिए—क्योंकि आज वे जिस जगह हैं, कल हम भी वहीं होंगे।

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