घर की देहरी पर अकेले बैठे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति, जो भावनात्मक अकेलेपन और सहारे की तलाश को दर्शाता है

बुज़ुर्गों की चुप्पी

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में, जहाँ हर कोई अपनी व्यस्तताओं में उलझा है, वहीं घर के बुज़ुर्ग धीरे-धीरे अकेले होते जा रहे हैं। जिन लोगों ने कभी हमें संभाला, वही आज अपने ही घर में सहारे और संवाद की तलाश करते दिखाई देते हैं। समस्या बुज़ुर्गों में नहीं, बल्कि बदलती हमारी संवेदनाओं में है। हमें यह समझना होगा कि उन्हें दया नहीं, बल्कि अपनापन, सम्मान और साथ चाहिए—क्योंकि आज वे जिस जगह हैं, कल हम भी वहीं होंगे।

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वृद्धाश्रम की बेंच पर अकेली बैठी एक बुजुर्ग महिला, हाथ में माला, चेहरे पर उदासी और आंखों में गहरी सोच, शांत और भावुक वातावरण।

बुढ़ापे की व्यथा

“बुढ़ापे की व्यथा” एक मार्मिक कविता है जो वृद्धाश्रम में बैठे माता-पिता की पीड़ा, उपेक्षा और टूटते पारिवारिक मूल्यों की करुण सच्चाई को उजागर करती है। यह रचना समाज को आईना दिखाती है और संतान को अपने कर्तव्यों की याद दिलाती है।

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घर छोटे हुए, लेकिन संस्थाएँ बड़ी क्यों?

आज के समय में संयुक्त परिवार तेजी से बिखर रहे हैं और लोग अलग-अलग रहना पसंद कर रहे हैं। नौकरी, शहर बदलना या बड़े परिवार की मजबूरी जैसी वजहें तो सामान्य हैं, लेकिन सबसे गंभीर बात यह है कि एक ही घर में रहते हुए भी लोग अपने-अपने चूल्हे अलग कर लेते हैं। दूसरी ओर, महिलाएँ समाज में नई-नई संस्थाएँ सफलतापूर्वक चला रही हैं, फिर सवाल उठता है—जब महिलाएँ बड़े संगठन संभाल सकती हैं तो परिवार को क्यों नहीं जोड़े रख पा रहीं?

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