
डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई
आज भी दिल में ज़िंदा है,
भीड़ भरे इस शहर के अंदर
मेरा बचपन कहीं ज़िंदा है।
वो कच्ची गलियाँ, वो सादा जीवन,
हर मोड़ कहानी कहता था,
हर आँगन में अपनापन था,
हर चेहरा अपना लगता था।
अब ऊँची इमारतों के साये में
खुद को कहीं खो बैठा हूँ,
रिश्तों की भीड़ में रहकर भी
तन्हा-सा मैं हो बैठा हूँ।
वो चूल्हे की रोटी की खुशबू
अब यादों में ही बसती है,
माँ के हाथों की वो गरमाहट
आँखों में नमी बन हँसती है।
खेतों की वो हरियाली जैसे
मन का सुकून चुरा लेती थी,
अब कंक्रीट के जंगल में
हर साँस भी बोझ लगती है।
गांव की वो शामें, वो सन्नाटा,
जिसमें भी संगीत था,
अब शोर में डूबे इस जीवन में
सुकून कहीं अतीत में था।
कभी लौटूँगा उस माटी में,
ये दिल हर रोज़ कहता है,
जहाँ खुशबू में बसता है अपनापन,
और हर रिश्ता सच्चा रहता है।
गांव नहीं बस एक जगह है,
वो तो मेरी पहचान है,
उसकी खुशबू में ही छिपा
मेरे जीवन का सम्मान है।
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