गांव की माटी की वो खुशबू
शहर की भीड़ और ऊँची इमारतों के बीच खड़े होकर भी मन बार-बार उसी गांव की ओर लौट जाता है, जहाँ माटी की खुशबू, माँ के हाथों की गरमाहट और रिश्तों की सच्चाई आज भी दिल में ज़िंदा है।

शहर की भीड़ और ऊँची इमारतों के बीच खड़े होकर भी मन बार-बार उसी गांव की ओर लौट जाता है, जहाँ माटी की खुशबू, माँ के हाथों की गरमाहट और रिश्तों की सच्चाई आज भी दिल में ज़िंदा है।
माज का जीवन कभी केवल नियमों या क़ानूनों पर नहीं चलता था, बल्कि आत्मसंयम, पश्चाताप और आपसी मेल-मिलाप पर टिका होता था। जब भी मान-अपमान की बात आती, लोग अहंकार को त्यागकर झुक जाते और पश्चाताप के साथ रिश्तों को सँभाल लेते। उस समय भाइयों में लड़ाई-झगड़े होते भी थे, लेकिन माँ के स्नेह के आगे सब झुक जाते और तुरन्त ही एक-दूसरे से गले मिल लेते।
घर-परिवार में रूठना-मनाना आम बात थी। लोग थोड़ी देर नाराज़ होकर भी घर लौट आते और अपनों का साथ नहीं छोड़ते। गाँव में दीवारें बनीं, लेकिन दिलों की दूरी कभी स्थायी नहीं रही। चूल्हा जलता देख पड़ोसी से आग माँगने जाना अपनत्व का प्रतीक था। जीवन सरल था और सम्बन्ध घनिष्ठ।
गाँव की छोटी-सी झोंपड़ियों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर करती है। अँधियारे में एक मृतप्राय दीपशिखा की तरह जीवन की झलक कहीं तहखाने में बंद पड़ी है। नेता केवल दिखावे के लिए चमक-धमक करते हैं, पर जब बत्ती बुझी होती है तो लालटेन भी घर को रोशन नहीं कर सकती। इसके बावजूद, झोपड़ी में रहने वाले कृशकाय लोग रातों को इस छोटी डिबरी-सी लालटेन की रौशनी से जीवन की आशा और संघर्ष को देख पाते हैं। यह कविता सामाजिक असमानता, संघर्ष और छोटे प्रकाश की महत्वता को सुंदर ढंग से चित्रित करती है।
गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।
समाचार पत्र के आठवें पृष्ठ के एक छोटे से समाचार ने उसे हिला दिया “ गाँव बिकाऊ है “| उसने इन तीन शब्दों को कई – कई बार पढ़ा | सोचने लगा , आवश्यकता और सुख के साथ – साथ पशु – पक्षी और मनुष्य तो बिक ही रहे थे अब गाँव भी ..`..
अजीब सा लगा उसे | घबराहट सी हुई |उसने अपने बैग को उठा कर गले में डाला और बाइक निकाल जा पहुंचा उस गाँव जहां बड़े – बड़े समाचार – पत्रों , चैनल्स की गाड़ियां साथ ही सरकारी तंत्र और वसाइयों की भी गाड़ियाँ खड़ी थीं | कैमरे चमक रहे थे | दाम लग रहे थे …
पता है किसके ……धूल उड़ाती , दरारों पटी बंजर जमीन के … अपनी ही गहराई नापते कुओं के … घर मकानों के… कोई नहीं पूछ रहा था पशुओं को ? न ही वहाँ के लोगों को ?