लालटेन

१) गाँव के अँधियारे की
दीपशिखा
आज कहीं तहखाने में
बंद, मृतप्राय पड़ी है।

२) झाड़ कर धूल
चमका रहे थे नेता,
किन्तु
बुझी हो बत्ती तो
कैसे रोशन करेगी
घर लालटेन…!

३) आज भी कृशकाय की
झोंपड़ी की रातों को
आँखें देती है
ये डिबरी-सी लालटेन…!

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता’, जयपुर (राजस्थान)

11 thoughts on “लालटेन

  1. धन्यवाद रचना को प्रकाशित करने के लिए 🙏🏻

  2. अति उत्तम उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ✍️💯👍
    हार्दिक बधाई 💐 मधु बहन “अमृता”🙏

  3. सच की लालटेन है आपकी रचना
    ग्रामीण जिंदगी यूं ही अंधकार में है ,
    और यह सच्चाई आपकी रचना में
    स्पष्ट है ।
    सुंदर रचना।

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