ज़िंदगी आखिर कट ही जाएगी

ज़िंदगी अंत में कट ही जाती है चाहे हम मोहब्बत में डूबे हों या किसी की नफ़रत से लड़ रहे हों। कभी दर्द के साये में गुज़रती है, तो कभी हँसी की छोटी-सी किरण उसे रोशन कर देती है।
जीवन की यही सच्चाई है: दो पल का सफ़र, जो हाथ से फिसलते हुए भी हमें कुछ सिखा जाता है। खुशियाँ छोटी हों या बड़ी, बाँट देने से ही दिल हल्का होता है। ग़मों को अंदर दबाकर रखने से वे बोझ बन जाते हैं लेकिन किसी अपने के साथ उन्हें साझा कर लिया जाए तो वही दर्द ताकत में बदल जाता है।

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कभी तुम्हारा कभी हमारा

ज़िंदगी कभी हमें सहारा देती है, कभी हम दूसरों के लिए सहारा बन जाते हैं। हालात चाहे जैसे हों, अमीर हो या ग़रीब, सबको तमीज़ से पेश आना होता है। भूख-प्यास, सुख-दुःख, किनारा या तूफ़ान — ये सब कभी तुम्हारे हिस्से आते हैं, कभी हमारे। यही जीवन का सच है कि नज़ारा बदलता रहता है और हर किसी की बारी आती है।”

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उम्मीदों की खिड़की से

ज़िंदगी में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएँ, उम्मीदों की खिड़की हमेशा खुली रहनी चाहिए। दुनिया कुछ भी कहे, लेकिन अपने हौसले को मज़बूत बनाए रखना ज़रूरी है। आंधियाँ आएँ तो भी दिल का दिया जलता रहना चाहिए। इंसान को पत्थर नहीं बनना है, बल्कि टूटकर और तराशकर अपने आप को बेहतर बनाना है। इम्तिहान तो जीवन में बार-बार आएँगे, लेकिन हर बार हमें अपने लक्ष्य पर टिके रहना है। यही उम्मीद और यही हौसला हमें आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।

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लालटेन

गाँव की छोटी-सी झोंपड़ियों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर करती है। अँधियारे में एक मृतप्राय दीपशिखा की तरह जीवन की झलक कहीं तहखाने में बंद पड़ी है। नेता केवल दिखावे के लिए चमक-धमक करते हैं, पर जब बत्ती बुझी होती है तो लालटेन भी घर को रोशन नहीं कर सकती। इसके बावजूद, झोपड़ी में रहने वाले कृशकाय लोग रातों को इस छोटी डिबरी-सी लालटेन की रौशनी से जीवन की आशा और संघर्ष को देख पाते हैं। यह कविता सामाजिक असमानता, संघर्ष और छोटे प्रकाश की महत्वता को सुंदर ढंग से चित्रित करती है।

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शमा और जिंदगी

काली रात में थरथराती हुई शमा की लौ अपने सपनों का प्रकाश लेकर जलती रहती है, चाहे हवा के झोंके उसे बुझाने की कोशिश करें। इसी तरह, ज़िंदगी भी निरंतर संघर्ष और कठिनाइयों के बीच आशाओं के साथ खड़ी रहती है। शमा दूसरों के अंधकार को दूर करने के लिए जलती है, और ज़िंदगी अपने पथ पर सपनों को आगे बढ़ाने के लिए बढ़ती रहती है। लौ का कंपकंपाना डर और अस्थिरता का प्रतीक है, लेकिन बुझने से पहले यह सौ गुना उजाला फैलाती है। शमा और जीवन दोनों यही सिखाते हैं—जलते रहो, उजागर रहो, संघर्ष और प्रकाश को अपनाओ, क्योंकि हर रात के बाद प्रभात अवश्य आता है।

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मुंबई: जहां हर धक्का सिखाता है जीना

मुंबई का आकर्षण दूर से देखने पर समंदर की लहरों, हैरिटेज इमारतों और तेज़ रफ्तार भागती ज़िंदगियों में नज़र आता है। लेकिन असली मुंबई की पहचान लोकल ट्रेनों की धक्का-मुक्की, जद्दोजहद और संघर्ष में छिपी है। यहाँ हर धक्का इंसान को जीना सिखाता है और हर मुश्किल उसे मज़बूत बनाती है।”

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स्वर्ग इसी जहाँ में

मनुष्य का असली मूल्य तभी है जब वह जीवन के अंधकार से उजाले की ओर बढ़ सके। अगर हम मृत्यु की चादर को हटाकर जीवन को नयी सुबह दे सकें, तभी हमारा अस्तित्व सार्थक है।
सच्चा जीवन वही है जहाँ हम प्रेम की एक बूँद पी भी सकें और किसी और को पिला भी सकें। जहाँ गिरने वाले को उठाने का सामर्थ्य हो, मुश्किलों में गीत गाने का साहस हो।
अगर हम अपने घर–आँगन को स्वर्ग में न बदल पाएँ, यदि दो दिलों की दूरियाँ कम न कर पाएँ, भूख से लड़ने के लिए रोटियाँ न जुटा पाएँ, और अन्याय देखते हुए भी आँख न उठा पाएँ—तो फिर चाँद पर जाने का क्या लाभ? ऐसे में हमें इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं।

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अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान

यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।

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कट चाय से कलम तक

“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”

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