हम करें कि रात ढल के पौ फटने,
ज़िंदगी की लाश पर से मौत का कफ़न हटे।
हम करें कि जी सकें, जिला सकें,
प्रेम की ही एक बूंद
पी सकें, पिला सकें।
कोई गिर पड़े कहीं,
न हम उसे उठा सकें।
मुश्किलों से जूझ कर,
न गीत गुनगुना सकें।
घर इसी जहाँ को
न स्वर्ग हम बना सकें, तो क्या करेगा आदमी,
जो चाँद पर भी जा सके,
दो दिलों की दूरियों को
पास भी न ला सकें।
हाथ दो मिलें न फिर भी
रोटियाँ जुटा सकें।
ज़ुल्म देखते रहें,
न आँख भी उठाई सकें।
तो हक़ नहीं हमें कि
हम भी आदमी कहा सकें।

प्रतिभा मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, रिटायर्ड प्रिंसिपल, जवाहर नवोदय विद्यालय
