सागर

सागर की बलखाती लहरें मानो किसी प्रियजन को पुकार रही हों। हर उठती-गिरती मौज एक गीत है—कोमल, मधुर और रहस्यमय। कभी लगता है कि ये लहरें चाँद से धीमे-धीमे बातें कर रही हैं, अपने भीतर छिपे राज़ को साझा कर रही हैं। हवा भी इसमें शामिल हो जाती है, गुनगुनाहट में एक नई धुन जोड़ देती है।

रात का आकाश सितारों से झिलमिलाता है, और सागर उस रोशनी को अपने सीने में समेटकर जैसे सुबह की प्रतीक्षा करता है। सुबह का आकर्षण उसे दीवाना बना देता है—हर लहर में एक झनक, जैसे झाँझर की मधुर ध्वनि।इन लहरों में न जाने कितनी कहानियाँ बसी हैं। कुछ रंगीन सपनों की, कुछ भोली नादानियों की। मन चाहता है कि इन पलों को पलकों में बाँध लूँ, जगमगाते मोतियों की तरह सँभालकर रख लूँ।

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मोह और प्रेम

लिखने को कुछ नहीं था, परंतु शब्द मस्तिष्क में ऐसे कुलबुला रहे थे मानो बाहर आने को व्याकुल हों।
मन के दो छोर सामने थे—एक ओर मोह, जो मुट्ठी में क़ैद था, और दूसरी ओर प्रेम, जो आज़ाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था। यह विडंबना ही थी कि प्रेम ने ही मोह को जन्म दिया, फिर भी उसी की कैद प्रेम को असह्य हो गई।मोह के भीतर संदेह के जीवाणु पलते रहे, जिन्हें प्रेम ने कभी स्वीकार नहीं किया।प्रेम बसंत की शुरुआत था—नवजीवन का उत्सव, जबकि मोह पतझड़ का सूना संदेश।
प्रेम उमड़ते समंदर की लहर था, मोह रेत का वह कण, जो मुट्ठी में थमता ही नहीं और फिसल जाने को आतुर रहता है।

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नारी

नारी केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि जीवन का उद्घोष है। नारी कई रूपों में विघटित है, गणना से परे, क्योंकि इसके रूप तो अगणित हैं। आज नारी अबला नहीं, बल्कि सबला बनकर अपने अधिकार और सम्मान के परचम लहरा रही है।

पुरुष प्रधान जगत में नारी अब पुरुष से कम नहीं है। नारी पृथ्वी की शक्ति है; बिना नारी के जगत शक्ति विहीन है। संपूर्ण सृष्टि में नारी के बिना सब कुछ ही अधूरा और स्तरहीन है। नारी केवल कामिनी नहीं, शस्त्र-शास्त्र की पर्याय है। नारी केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि कभी-कभी मृत्यु भी बन जाती है।

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फूलों की माला, हवा का राग”

“हर्षित धरा, हर्षित अंबर, कोहरे की विदाई, भौंरे और तितलियों की मुस्कान। दहकते पलाश, हरे-हरे परिधान, पीली सरसों की सजती दुकान। गेहूँ और चने की झूमती बाली, कोयल की मतवाली कूक। अमलतास की झूलती डालियाँ, फूलों की माला लिए प्रीत खड़ी है द्वार पर—सारी धरती बसंत से प्यार में डूबी हुई।”

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 औरत…

औरत अपने भीतर अनगिनत भावों और संवेदनाओं को समेटती है। उसकी आँखों में उफनते समंदर को वह बाँध देती है, और दिल में उमड़ने वाले सैलाब को रोक लेती है। उसके ज़ेहन में कई विचार घूमते हैं, नस-नस में खामोशी दौड़ती है, और कश्मकश में उसकी रातें बेहिसाब बीतती हैं।

जीवन में आए पुरुष – पिता, भाई, पति या बेटा – उनके दुख, दर्द, बुराइयाँ, कहानियाँ और कई राज़ वह अपने सीने में दफ़्न कर लेती है। इतने सब कुछ होने के बावजूद, समाज अक्सर यह कहता है कि औरत के पेट में कोई बात नहीं छिपती। लेकिन सच यह है कि औरत अपने भीतर पूरा ब्रह्मांड समेटे हुए है।

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शमा और जिंदगी

काली रात में थरथराती हुई शमा की लौ अपने सपनों का प्रकाश लेकर जलती रहती है, चाहे हवा के झोंके उसे बुझाने की कोशिश करें। इसी तरह, ज़िंदगी भी निरंतर संघर्ष और कठिनाइयों के बीच आशाओं के साथ खड़ी रहती है। शमा दूसरों के अंधकार को दूर करने के लिए जलती है, और ज़िंदगी अपने पथ पर सपनों को आगे बढ़ाने के लिए बढ़ती रहती है। लौ का कंपकंपाना डर और अस्थिरता का प्रतीक है, लेकिन बुझने से पहले यह सौ गुना उजाला फैलाती है। शमा और जीवन दोनों यही सिखाते हैं—जलते रहो, उजागर रहो, संघर्ष और प्रकाश को अपनाओ, क्योंकि हर रात के बाद प्रभात अवश्य आता है।

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अधूरी बारिश की दास्तान

गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।

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स्त्री मन

एक स्त्री का मन बेहद संवेदनशील और मजबूत होता है। किसी के चले जाने का एहसास उसे अंदर से हिला देता है, लेकिन वही स्त्री अपनी पीड़ा को सहकर अपने अपनों के लिए जीवित रहती है। अकेलेपन और खामोशियों के बीच भी वह निरंतर प्रयास करती है, असंभव को संभव बना देती है, और छल जाने पर भी दूसरों के लिए दुआएँ देती है। स्त्री का मन भावनाओं और बलिदान का प्रतीक है।

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चांद में दाग

चाँद में दाग़ जरूर होता है, लेकिन मानव भी कभी पूर्ण नहीं होता। कमियाँ सभी में होती हैं, फिर भी केवल चाँद ही बदनाम माना जाता है। उसकी खूबसूरती, गुण और चाँदनी की रौशनी, अंधेरे को काट देने की क्षमता, पूर्णमासी की छटा—सब कुछ अद्भुत है। अमावस की रात को उसकी कमी महसूस होती है, लेकिन आसमान में उसकी सुंदरता और प्यारा प्रभाव सबको भाता है। अक्सर लोग केवल दोष देखते हैं, जबकि अगर हम अपने गिरेबान में झाँकें, तो पता चलता है कि हमारी खुद की कमियाँ भी उतनी ही स्पष्ट हैं।

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स्वर्ग इसी जहाँ में

मनुष्य का असली मूल्य तभी है जब वह जीवन के अंधकार से उजाले की ओर बढ़ सके। अगर हम मृत्यु की चादर को हटाकर जीवन को नयी सुबह दे सकें, तभी हमारा अस्तित्व सार्थक है।
सच्चा जीवन वही है जहाँ हम प्रेम की एक बूँद पी भी सकें और किसी और को पिला भी सकें। जहाँ गिरने वाले को उठाने का सामर्थ्य हो, मुश्किलों में गीत गाने का साहस हो।
अगर हम अपने घर–आँगन को स्वर्ग में न बदल पाएँ, यदि दो दिलों की दूरियाँ कम न कर पाएँ, भूख से लड़ने के लिए रोटियाँ न जुटा पाएँ, और अन्याय देखते हुए भी आँख न उठा पाएँ—तो फिर चाँद पर जाने का क्या लाभ? ऐसे में हमें इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं।

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