स्वर्ग इसी जहाँ में
मनुष्य का असली मूल्य तभी है जब वह जीवन के अंधकार से उजाले की ओर बढ़ सके। अगर हम मृत्यु की चादर को हटाकर जीवन को नयी सुबह दे सकें, तभी हमारा अस्तित्व सार्थक है।
सच्चा जीवन वही है जहाँ हम प्रेम की एक बूँद पी भी सकें और किसी और को पिला भी सकें। जहाँ गिरने वाले को उठाने का सामर्थ्य हो, मुश्किलों में गीत गाने का साहस हो।
अगर हम अपने घर–आँगन को स्वर्ग में न बदल पाएँ, यदि दो दिलों की दूरियाँ कम न कर पाएँ, भूख से लड़ने के लिए रोटियाँ न जुटा पाएँ, और अन्याय देखते हुए भी आँख न उठा पाएँ—तो फिर चाँद पर जाने का क्या लाभ? ऐसे में हमें इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं।
