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छोटा बच्चा अपनी गुल्लक देकर जरूरतमंद की मदद करता हुआ, प्रेरणादायक हिंदी कहानी

उम्मीद

यह सुनते ही रोहित तुरंत घर के अंदर गया और अपना गुल्लक लेकर आया।उसने वह गुल्लक राहुल के पिता को देते हुए कहा,‘आप इन पैसों से राहुल का इलाज करवा दीजिए।’
यह वही पैसे थे, जिन्हें वह अपनी साइकिल खरीदने के लिए जमा कर रहा था.लेकिन उस दिन उसकी छोटी-सी सोच ने किसी के घर में बड़ी उम्मीद जगा दी।”

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बचपन को बाँहों में भर लो…

बच्चे रंग, खुशबू और उम्मीदों से भरे उस चमन के फूल हैं जिनकी नर्म हथेलियों पर उनकी पूरी तकदीर लिखी होती है। कहीं धूल-भरी मुट्ठियाँ हैं, कहीं हँसी से भरा बालपन और कहीं वही बचपन घरों में कैद होकर बहेलियों की निगाहों से डरता है। उनके मस्तक वात्सल्य से भीगने के लिए बने हैं, न कि भय से काँपने के लिए। पर सच यह है कि कुछ बच्चे शिक्षा के मंदिरों में बैठते हैं, जबकि कुछ बाहर मायूस खड़े रह जाते हैं.

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प्रेम और नफ़रत

प्रेम वह शक्ति है जो जीवन को जोड़ती है और नफ़रत वह आग है जो उसे भस्म कर देती है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मुस्कान होती है; जहाँ नफ़रत होती है, वहाँ विनाश। इसलिए प्रेम बाँटिए, नफ़रत छोड़िए क्योंकि प्रेम ही सच्ची मानवता है।

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किसको ढोओगे

कविता सत्ता, समाज और मानवता पर गहरा प्रश्न उठाती है। कवि पूछता है. आखिर तुम किसे अपने कंधों पर उठाओगे, किसे बचाओगे? जब नैया मझधार में डूबेगी, तब कौन किसे पार लगाएगा? सत्ता की लालसा में जो सबको मिटा देने की सोच है, वही अंततः विनाश का कारण बनेगी। भारत की धरती हर धर्म, हर जाति का आंचल है. यहाँ कीचड़ में भी कमल खिलता है। लेकिन जब राजनीति भाजन का रूप लेती है, तब वही ताक़त अपने ही हाथों से हार जाती है। गरीब, सच्चे, उज्जवल मन वाले लोग पूछते हैं. क्या हर चुनाव में बस हम पर ही डोरे डालोगे, क्या सबको साथ में मारोगे?

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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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ये कैसी भोर..

यह कैसी भोर है जहाँ सूरज की तपिश बढ़ रही है लेकिन शीतलता कहीं नहीं है। फूल खिले हैं पर उनमें महक नहीं, हवा बह रही है लेकिन उसमें सुकून नहीं। चारों ओर आपदाएँ बढ़ रही हैं और कवि का मन व्यथित है। उत्तराखंड की तबाही में असंख्य लोग अपने प्रियजनों को खो चुके हैं।

समय अभी भी है—हमें सँभलना होगा। हिमालय के साथ प्रयोग और परमाणु अत्याचार रोकना होगा, वरना यह विनाशकारी रास्ता भयानक परिणाम देगा। प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर ज्वालामुखी फूटेंगे, भूकंप और सुनामी आएँगे और जीवन झुलस जाएगा। प्रकृति किसी की संपत्ति नहीं है, इस पर राजनीति करना आत्मघाती है। जब कुदरत का न्याय चलता है तब किसी की वकालत काम नहीं आती। मनुष्य को अपने स्वार्थ छोड़कर प्रकृति के साथ संतुलन बनाना ही होगा, नहीं तो भोर भी अँधियारी लगने लगेगी।

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कभी तुम्हारा कभी हमारा

ज़िंदगी कभी हमें सहारा देती है, कभी हम दूसरों के लिए सहारा बन जाते हैं। हालात चाहे जैसे हों, अमीर हो या ग़रीब, सबको तमीज़ से पेश आना होता है। भूख-प्यास, सुख-दुःख, किनारा या तूफ़ान — ये सब कभी तुम्हारे हिस्से आते हैं, कभी हमारे। यही जीवन का सच है कि नज़ारा बदलता रहता है और हर किसी की बारी आती है।”

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स्वर्ग इसी जहाँ में

मनुष्य का असली मूल्य तभी है जब वह जीवन के अंधकार से उजाले की ओर बढ़ सके। अगर हम मृत्यु की चादर को हटाकर जीवन को नयी सुबह दे सकें, तभी हमारा अस्तित्व सार्थक है।
सच्चा जीवन वही है जहाँ हम प्रेम की एक बूँद पी भी सकें और किसी और को पिला भी सकें। जहाँ गिरने वाले को उठाने का सामर्थ्य हो, मुश्किलों में गीत गाने का साहस हो।
अगर हम अपने घर–आँगन को स्वर्ग में न बदल पाएँ, यदि दो दिलों की दूरियाँ कम न कर पाएँ, भूख से लड़ने के लिए रोटियाँ न जुटा पाएँ, और अन्याय देखते हुए भी आँख न उठा पाएँ—तो फिर चाँद पर जाने का क्या लाभ? ऐसे में हमें इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं।

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