
शोभा सोनी बड़वानी मध्य-प्रदेश
तप रहा सूरज का गोला है।
गुल हैं मगर महक नहीं,
पवन चली मगर शीतलता नहीं।
बढ़ती नित आपदाएँ देख,
आज कवि मन रोया है।
उत्तराखंड की तबाही में
लाखों ने अपनों को खोया है।
अब भी वक्त है सँभल जाओ,
परीक्षण से हिमालय को न सताओ।
मत करो परमाणु अत्याचार,
रोको ये भयंकर नरसंहार।
अब भोर भी नहीं सुहाती है,
तपती किरणें हृदय चीर जाती हैं।
स्वार्थ में प्रकृति से न दुष्कर्म करो,
मनुज! अब तो जागो, कुछ शर्म करो।
बचा लो विनाश से जन-जीवन को,
पंछियों, पशुओं और जंगल को।
वरना कुदरत जब रंग दिखाएगी,
कोई होशियारी नहीं काम आएगी।
फूटेंगे लाखों ज्वालामुखी,
जिंदगियाँ यूँ ही झुलस जाएँगी।
आएँगे भीषण भूकंप, सुनामी,
भोर भी अँधियारी नजर आएगी।
बंद करो आपदाओं पे राजनीति,
ये कुदरत नहीं किसी की संपत्ति।
जब इसकी अदालत चलती है,
तब किसी की वकालत नहीं चलती है।

बिल्कुल सही