ये कैसी भोर..

यह कैसी भोर है जहाँ सूरज की तपिश बढ़ रही है लेकिन शीतलता कहीं नहीं है। फूल खिले हैं पर उनमें महक नहीं, हवा बह रही है लेकिन उसमें सुकून नहीं। चारों ओर आपदाएँ बढ़ रही हैं और कवि का मन व्यथित है। उत्तराखंड की तबाही में असंख्य लोग अपने प्रियजनों को खो चुके हैं।

समय अभी भी है—हमें सँभलना होगा। हिमालय के साथ प्रयोग और परमाणु अत्याचार रोकना होगा, वरना यह विनाशकारी रास्ता भयानक परिणाम देगा। प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर ज्वालामुखी फूटेंगे, भूकंप और सुनामी आएँगे और जीवन झुलस जाएगा। प्रकृति किसी की संपत्ति नहीं है, इस पर राजनीति करना आत्मघाती है। जब कुदरत का न्याय चलता है तब किसी की वकालत काम नहीं आती। मनुष्य को अपने स्वार्थ छोड़कर प्रकृति के साथ संतुलन बनाना ही होगा, नहीं तो भोर भी अँधियारी लगने लगेगी।

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कभी तुम्हारा कभी हमारा

ज़िंदगी कभी हमें सहारा देती है, कभी हम दूसरों के लिए सहारा बन जाते हैं। हालात चाहे जैसे हों, अमीर हो या ग़रीब, सबको तमीज़ से पेश आना होता है। भूख-प्यास, सुख-दुःख, किनारा या तूफ़ान — ये सब कभी तुम्हारे हिस्से आते हैं, कभी हमारे। यही जीवन का सच है कि नज़ारा बदलता रहता है और हर किसी की बारी आती है।”

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व्यथा वृक्ष की…

कविता वृक्ष की पीड़ा और धैर्य का जीवंत चित्र खींचती है। गहरी जड़ों वाला यह वृक्ष कई अत्याचार और आघात सहकर भी खड़ा है। उसका कोमल तन और मन भले ही पत्ते-पत्ते, रेशा-रेशा झर गया हो, पर वह पूरी तरह टूटा नहीं। जर्जर होने के बाद भी वह आशा से भरा है कि उसकी शाखाओं पर फिर से नवकोपलें फूटेंगी, हरा-भरा जीवन लौटेगा।
वह स्वयं से प्रश्न करता है कि आखिर उसने क्या ग़लत किया था—सबको आसरा देकर, फल-फूल देकर, उदर-तृप्ति कराकर भी क्यों आहत होना पड़ा? पर साथ ही उसमें यह अटूट विश्वास है कि उसका अस्तित्व ही धरती के जीवन का आधार है। वह मनुष्यों को स्मरण कराता है—यदि वे उसे पोषित करेंगे तो बदले में वह उन्हें संरक्षण देगा।

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