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बचपन को बाँहों में भर लो…

डॉ .आशा सिंह सिकरवार, अहमदाबाद (गुजरात)

रंग है, खुशबू है,
चमन के फूल हैं।
निश्छल हैं, स्निग्ध पत्तियाँ हैं—
मुलायम हथेलियों पर
ताज़ा खींची लकीर है,
मुट्ठी में इनकी तक़दीर है,
ये ही समाज के मूल हैं।

कहीं धूल-भरी मुट्ठियाँ हैं,
कहीं बालपन की अठखेलियाँ हैं।
कहीं घर में क़ैद है बचपन,
और कहीं खड़ा है बहेलिया।

गुलाब की पंखुड़ियों को
हँसी से भरना है।
चुंबन से भरे मस्तक हैं,
वात्सल्य के झरने हैं।

उम्मीद भरी आँखें
ताक रही हैं।
हाथ खाली हैं,
देह ठिठुरती है।
पेट सवाल है—
जीवन में न लय है,
न ताल है,
न कोई सुरक्षा,
न कोई संबल-सा भाल है।

कुछ शिक्षा के मंदिर में बैठे हैं,
कुछ बाहर मायूस खड़े हैं।

बच्चों को गले लगाकर बताओ—
ये अकेले नहीं हैं।
बेरहम बनकर
उन्हें मत सताओ।

3 thoughts on “बचपन को बाँहों में भर लो…

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