स्त्री का संवेदनशील चित्रणजो हर मौसम में दूसरों के लिए बदलती है

एक औरत

“एक औरत मुस्कुराते हुए ढाल लेती है खुद को
तुम्हारी ज़रूरत के हर मौसम में… पर क्या तुम ढाल सकते हो खुद को उसकी मुस्कुराहट के लिए?”
एक छोटा सा सवाल, जो रिश्तों की पूरी सच्चाई खोल देता है।

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आधुनिकता बनाम परंपरा को दर्शाता भावुक और प्रेरणादायक कलात्मक चित्र

मेरे नयन तरस गए भगवन

यह कविता वर्तमान समाज की बदलती सोच, सोशल मीडिया के प्रभाव और घटते संस्कारों पर गहरी चोट करती है। धरती माँ की पुकार के माध्यम से यह रचना वीर शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान योद्धाओं के आदर्शों को पुनर्जीवित करने का संदेश देती है। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के संवादों के जरिए यह कविता आत्मचिंतन, संस्कार और वीरता को फिर से अपनाने की प्रेरणा देती है।

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14 घंटे की मेहनत, फिर भी चेहरे पर मुस्कान

अनदेखी नायिका: लक्ष्मी भोइर

यह कहानी है पालघर की लक्ष्मी गोपाल भोइर की, जो पिछले 30 वर्षों से हर दिन सुबह 2 बजे उठकर मंडी से ताज़ी सब्ज़ियाँ लाती हैं और मुंबई में बेचती हैं। 14 घंटे की कड़ी मेहनत के बावजूद उनके चेहरे पर मुस्कान और दिल में संतोष है। यह लेख उन अनदेखी महिलाओं की मेहनत और आत्मसम्मान को उजागर करता है, जिन्हें समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। जानिए एक साधारण दिखने वाली महिला की असाधारण जीवन यात्रा।

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अंधेरे कमरे में घुसता हुआ उजाला जो छिपी हुई सच्चाइयों को उजागर कर रहा है

उजाले की ओर

“उजाले की ओर” एक प्रतीकात्मक लघुकथा है, जिसमें अंधकार और प्रकाश के टकराव के जरिए समाज की छिपी बुराइयों को उजागर किया गया है। यह कहानी बताती है कि सच का प्रकाश जब फैलता है, तो अंधेरा टिक नहीं पाता।

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एस. एम. जोशी ऑडिटोरियम, पुणे में होने वाले सृजन महोत्सव के दौरान लोककला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का दृश्य।

कला, संस्कार और समाज का संगम

पुणे में आने वाले दिनों में कला, संस्कृति और सामाजिक सरोकार का अनोखा संगम देखने को मिलेगा। सृजन फाउंडेशन की ओर से 13 से 15 जनवरी तक तीन दिवसीय ‘सृजन महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है। यह महोत्सव अपने 10वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है और इस बार नवी पेठ स्थित एस. एम. जोशी ऑडिटोरियम में प्रतिदिन शाम 5 बजे से रात 8 बजे तक आयोजित होगा।

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इंजीनियर भावना और मैनेजर यश का सम्मान

सांताक्रूज़ पश्चिम में आयोजित कार्यक्रम में ऑल इंडिया यादव महासभा, मुंबई ने सामाजिक कार्यों में सक्रिय इंजि. भावना और प्रबंधक यश का सम्मान किया। समारोह में चंद्रवीर बंशीधर यादव, गिरधारीलाल पंडित, डॉ. अमर बहादुर पटेल और अन्य गणमान्य उपस्थित रहे। यह कार्यक्रम समाज में सकारात्मक योगदान देने वालों को प्रेरित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना गया।

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बचपन को बाँहों में भर लो…

बच्चे रंग, खुशबू और उम्मीदों से भरे उस चमन के फूल हैं जिनकी नर्म हथेलियों पर उनकी पूरी तकदीर लिखी होती है। कहीं धूल-भरी मुट्ठियाँ हैं, कहीं हँसी से भरा बालपन और कहीं वही बचपन घरों में कैद होकर बहेलियों की निगाहों से डरता है। उनके मस्तक वात्सल्य से भीगने के लिए बने हैं, न कि भय से काँपने के लिए। पर सच यह है कि कुछ बच्चे शिक्षा के मंदिरों में बैठते हैं, जबकि कुछ बाहर मायूस खड़े रह जाते हैं.

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खामोश चीख और मां का विश्वास

शुरू शुरू में मुझे विवेक सर से बहुत डर लगता था लेकिन धीरे-धीरे मुझे उनके स्पर्श की आदत हो गई और मैं उनके साथ सहज होने लगी थी, मुझे नहीं पता कि वह स्पर्श मुझे अच्छा लगता था या बुरा लगता था ? मां को बताना चाहती थी पर डरती थी , सोचती थी मां पापा मेरे बारे में क्या सोचेंगे ….. क्या विवेक सर मुझे प्यार करते हैं ? …… कैसा प्यार है यह ?

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