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कला, संस्कार और समाज का संगम

एस. एम. जोशी ऑडिटोरियम, पुणे में होने वाले सृजन महोत्सव के दौरान लोककला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का दृश्य।

पुणे में 10वां सृजन महोत्सव, लोककला से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक

पुणे-पुणे में आने वाले दिनों में कला, संस्कृति और सामाजिक सरोकार का अनोखा संगम देखने को मिलेगा। सृजन फाउंडेशन की ओर से 13 से 15 जनवरी तक तीन दिवसीय ‘सृजन महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है। यह महोत्सव अपने 10वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है और इस बार नवी पेठ स्थित एस. एम. जोशी ऑडिटोरियम में प्रतिदिन शाम 5 बजे से रात 8 बजे तक आयोजित होगा।

इस महोत्सव की खास बात यह है कि यह केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोककला के संरक्षण के साथ-साथ समाज की सेहत का भी ध्यान रखता है। सृजन फाउंडेशन के अध्यक्ष अधीश पायगुडे के अनुसार, महोत्सव सभी के लिए निःशुल्क है और प्रवेश ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर दिया जाएगा।

लोककला के रंग में रंगेगा पहला दिन

महोत्सव के पहले दिन, 13 जनवरी को ‘साहित्य के लोकरंग’ कार्यक्रम के जरिए महाराष्ट्र की समृद्ध लोकपरंपरा को मंच पर सजीव किया जाएगा। ओवी, भारुड़, अभंग, लावणी, गोंधळ और पोवाड़ा जैसे लोककलात्मक रूपों को वैचारिक और संगीतमय अंदाज़ में प्रस्तुत किया जाएगा। इस प्रस्तुति के माध्यम से लोकसंस्कृति की जड़ों को नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

संत ज्ञानेश्वर की जीवनगाथा संगीतमय रूप में

दूसरे दिन, 14 जनवरी को संत श्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराज की 750वीं जयंती के उपलक्ष्य में ‘नमो ज्ञानेश्वरा’ कार्यक्रम आयोजित होगा। इस प्रस्तुति में संत ज्ञानेश्वर महाराज के जीवन, विचार और दर्शन को संगीत और कथा के माध्यम से दर्शकों के सामने रखा जाएगा। यह कार्यक्रम आध्यात्मिक अनुभूति के साथ सांस्कृतिक चेतना को भी मजबूत करने वाला रहेगा।

समाजसेवा का सम्मान और स्वास्थ्य की पहल

महोत्सव के अंतिम दिन, 15 जनवरी को सृजन फाउंडेशन और कोहिनूर ग्रुप की ओर से दिया जाने वाला ‘सृजन कोहिनूर अवॉर्ड’ प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता जयवंत कोंडविलकर को प्रदान किया जाएगा।

इसके साथ ही, सृजन फाउंडेशन ने महोत्सव को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ते हुए जहांगीर हॉस्पिटल के सहयोग से तीनों दिन निःशुल्क प्राथमिक स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन भी किया है। इसमें ब्लड प्रेशर, रैंडम ब्लड शुगर, आंखों की जांच और अन्य बुनियादी स्वास्थ्य परीक्षण निःशुल्क किए जाएंगे।

कुल मिलाकर, सृजन महोत्सव सिर्फ एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि कला, अध्यात्म और समाजसेवा का एक सशक्त मंच बनकर उभर रहा है।


2 thoughts on “कला, संस्कार और समाज का संगम

    1. धन्यवाद, ध्यान दिलाने के लिए, आप जैसे सजग पाठकों की हमें अत्यंत आवश्यकता है, लेकिन आपने जिसका उल्लेख किया है.. कार्यक्रम का प्रेसनोट था.. प्रेस नोट भेजने वाले से गलती हुई है.. लेकिन इसके जिम्मेदार हम भी हैं, क्योंकि ठीक से चेक नहीं किया.. रचनाओं में एआई का उपयोग नहीं किया जाता. सिर्फ फोटो को छोड़कर.. रचनाएं जैसी हैं वैसी स्थिति में पब्लिश की जाती है.. मामूल वर्तनी के सुधार के साथ… आप अपना नाम भी लिखते तो ज्यादा अच्छा रहता.. एक बार फिर धन्यवाद
      -सुरेश परिहार

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